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आसाराम बापू के आश्रम की जमीन पर गुजरात सरकार की नजर

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को नोटिस जारी कर दिया

  • गुजरात हाईकोर्ट का फैसला सरकारी पक्ष में

  • अदालत ने पूछा आरोप साबित करना होगा

  • बचाव पक्ष ने कहा नोटिस में खामियां हैं

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए गुजरात के मोटेरा स्थित आसाराम बापू के आश्रम की भूमि के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई जब्ती और बेदखली की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक आश्रम के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने गुजरात सरकार द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस  की स्पष्टता पर गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि नोटिस में उन आरोपों का कोई ठोस आधार या विवरण नहीं दिया गया है, जिनके आधार पर कार्रवाई शुरू की गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की, मुनाफाखोरी के आरोप क्या हैं? आपको विशिष्ट होना होगा। इतने अस्पष्ट नोटिस पर आप जवाब की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? प्रथम दृष्टया आपका नोटिस भौतिक विवरणों से रहित है। अदालत ने राज्य सरकार को 5 मई तक अपना विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह पूरा विवाद मोटेरा गांव में आश्रम ट्रस्ट को आवंटित भूमि से जुड़ा है। मूल रूप से 1980 में आश्रम को 6,261 वर्ग मीटर भूमि आवंटित की गई थी, जिसे बाद में 1992 में बढ़ाकर कुल 16,261 वर्ग मीटर (नियमितीकरण के बाद) कर दिया गया था। हालांकि, राजस्व अधिकारियों का दावा है कि वर्तमान में आश्रम के कब्जे में लगभग 49,758 वर्ग मीटर भूमि है, जिसमें से लगभग 15,778 वर्ग मीटर भूमि अवैध रूप से कब्जाई गई है।

गुजरात उच्च न्यायालय ने पहले सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि ट्रस्ट ने आवंटन की शर्तों का उल्लंघन किया है और साबरमती नदी के किनारे की भूमि पर भी अतिक्रमण किया है। साथ ही, बिना अनुमति के कई निर्माण कार्य किए गए हैं।

आश्रम ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि सरकार की यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है। ट्रस्ट का दावा है कि यह कार्रवाई सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव और 2036 ओलंपिक से संबंधित बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भूमि खाली कराने के उद्देश्य से की जा रही है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया था, लेकिन अब मामला देश की सर्वोच्च अदालत के पास है। कोर्ट अब इस बात की जांच करेगा कि क्या ट्रस्ट वास्तव में अतिक्रमण का दोषी है या नोटिस की प्रक्रिया में कानूनी खामियां हैं।