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झुलसता भारत और नीतिगत शून्यता की चुनौती

वर्तमान में पूरा भारत एक ऐसी भीषण गर्मी की चपेट में है, जो अब केवल मौसम का मिजाज नहीं बल्कि एक पारिस्थितिक आपातकाल बन चुकी है। देश के कई हिस्सों में पारा 45 से 50 डिग्री सेल्सियस को छू रहा है। वैज्ञानिक स्पष्ट रूप से इसे जलवायु परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रभाव मान रहे हैं। लेकिन क्या हम केवल प्रकृति को दोष देकर अपनी जिम्मेदारियों से बच सकते हैं? सच तो यह है कि हमने विकास की अंधी दौड़ में उन सुरक्षा कवचों को खुद ही नष्ट कर दिया है, जो हमें इस तपिश से बचा सकते थे।

सूर्य की रोशनी अब केवल उजाला नहीं, बल्कि झुलसाने वाली आग बन गई है। वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता के कारण ग्लोबल वार्मिंग का स्तर बढ़ा है। इसके साथ ही, हानिकारक पराबैंगनी किरणों का सीधा धरती पर पहुंचना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। जंगलों की कटाई के कारण कार्बन सोखने की धरती की क्षमता घट गई है, जिससे अर्बन हीट आइलैंड का प्रभाव शहरों को भट्टी बना रहा है।

आजादी के बाद से अब तक वन विभाग द्वारा करोड़ों पेड़ लगाने के दावे किए गए। यदि ये दावे कागजों से उतरकर जमीन पर सच साबित हुए होते, तो आज भारत का आधे से अधिक भू-भाग सघन वनों से ढका होता। वास्तविकता इसके उलट है। हर साल मानसून में करोड़ों पौधे रोपे जाते हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में उनमें से 10 फीसद भी जीवित नहीं बच पाते। केवल पेड़ लगाना जंगल बनाना नहीं है। प्राकृतिक जंगलों की जगह एक ही प्रकार के पेड़ों का रोपण जैव-विविधता को नष्ट कर रहा है।

सड़कों के चौड़ीकरण और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर दशकों पुराने विशाल वृक्षों को मिनटों में काट दिया जाता है, जबकि उनके बदले लगाए गए छोटे पौधे उस पारिस्थितिकी तंत्र की भरपाई करने में दशकों का समय लेते हैं। गर्मी के साथ-साथ जलसंकट ने देश के बड़े हिस्से को अपनी जकड़ में ले लिया है। भारत की नदियां, जिन्हें हम जीवनदायिनी कहते हैं, आज खुद जीवन की भीख मांग रही हैं। प्राकृतिक जलाशय और तालाब, जो कभी वर्षा जल संचयन के मुख्य स्रोत थे, आज कंक्रीट के जंगलों के नीचे दब चुके हैं। भूजल रिचार्ज के रास्ते बंद हो गए हैं।

गिरता भूजल स्तर: बढ़ती आबादी की प्यास बुझाने और सिंचाई के लिए भूजल का अंधाधुंध दोहन किया गया है। आज स्थिति यह है कि देश के कई शहरों में जीरो वाटर डे की आहट सुनाई देने लगी है। जो नदियां बह रही हैं, वे कचरे और रसायनों के कारण नालों में तब्दील हो चुकी हैं। यह विडंबना है कि इतनी बड़ी आपदाओं के बावजूद सरकार के पास कोई दीर्घकालिक और एकीकृत समाधान नहीं दिखता। हमारी नीतियां अक्सर तदर्थ होती हैं। जब प्यास लगती है, तब कुआं खोदने की तर्ज पर टैंकरों से पानी भेजा जाता है, लेकिन जल संचयन की पुरानी पद्धतियों को पुनर्जीवित करने के लिए कोई बड़ा बजट आवंटित नहीं होता।

पर्यावरण कानून कागजों पर सख्त हैं, लेकिन धरातल पर क्रियान्वयन बेहद लचीला है। उद्योग और खनन लॉबी के सामने अक्सर पर्यावरण हितों की अनदेखी कर दी जाती है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को एक रहने लायक धरती सौंपनी है, तो हमें तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने होंगे। शहरों में छोटे-छोटे जंगलों का निर्माण करना होगा ताकि स्थानीय तापमान को कम किया जा सके। केवल सफाई नहीं, बल्कि नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना होगा। हर घर और हर व्यावसायिक इमारत के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाना होगा, और इसका उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना लगाना होगा।

नीतिगत बदलाव: सरकार को इकोनॉमी और इकोलॉजी के बीच संतुलन बनाना होगा। विकास की परिभाषा में ग्रीन जीडीपी को शामिल करना समय की मांग है। भीषण गर्मी और जलसंकट केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि हमारे कुप्रबंधन का नतीजा है। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है। यदि हम अब भी नहीं जागे और केवल कागजी योजनाओं में उलझे रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के कई हिस्से रहने योग्य नहीं बचेंगे।

पेड़ लगाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक युद्ध स्तर का अभियान होना चाहिए—तभी हम अपनी धरती को मरुस्थल बनने से बचा पाएंगे। इन चुनौतियों के बीच अरावली की पहाड़ियां जरूरी है या खनन, यह प्राथमिकता भी सर चढ़कर बोल रहा है। पक्के मकान बनाने में पूंजीवादी सोच ने भूजल स्तर को रिचार्ज करने की प्रथा को खत्म कर दिया है ताकि हम बोरिंग जैसे कृत्रिम जल समाधानों के भरोसे हो जाएं। देश को चाहिए कि वह अपनी पुरानी परंपरा और प्राकृतिक समाधान की तरफ लौट चले, जहां हरियाली के साथ साथ जीवन बड़े आराम से चलता था और किसी को इससे कोई परेशानी भी नहीं होती थी।