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बेंगलुरू के बन्नेरघट्टा में चीतों की दस्तक

कर्नाटक में पहले से जारी वन्य जीवन संरक्षण का नया आयाम

  • दक्षिण अफ्रीका से लाये गये हैं चीते

  • चिड़ियाघर में इन सभी को रखा गया है

  • इनकी नियमित स्वास्थ्य जांच हो रही है

राष्ट्रीय खबर

बेंगलुरू: भारत के चीता संरक्षण अभियान को शनिवार को उस समय बड़ी सफलता मिली, जब कर्नाटक देश से विलुप्त हो चुके इन शानदार जीवों की आबादी को पुनर्जीवित करने के राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गया। दक्षिण अफ्रीका से एक स्वीकृत पशु विनिमय कार्यक्रम के तहत कुल चार चीते (एसिनोनिक्स जुबेटस) शनिवार तड़के बेंगलुरू के बन्नेरघट्टा पहुंचे। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के चीतों के विपरीत, जो इन-सिटु (प्राकृतिक आवास) संरक्षण का हिस्सा हैं, दक्षिण अफ्रीका के इंदुना प्राइमेट एंड पैरट पार्क से आए ये दो नर और दो मादा चीते एक्स-सिटु (चिड़ियाघर या कृत्रिम परिवेश) संरक्षण कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

हवाई अड्डे पर भव्य स्वागत दुनिया के सबसे तेज़ ज़मीनी स्तनपायी के इन दो जोड़ों का स्वागत शनिवार रात 1:15 बजे केम्पेगौड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के कार्गो टर्मिनल पर वन मंत्री ईश्वर खंड्रे और कर्नाटक चिड़ियाघर प्राधिकरण के अधिकारियों द्वारा किया गया। इस ऐतिहासिक पल पर खुशी जाहिर करते हुए खंड्रे ने कहा, कभी चीते भारतीय परिदृश्य का अभिन्न अंग थे और कर्नाटक में इन्हें स्थानीय रूप से शिवंगी के नाम से जाना जाता था। दुर्भाग्य से, अत्यधिक शिकार और आवास के विनाश के कारण ये विलुप्त हो गए। इन्हें वापस लाना और हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में ढालना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

कड़े स्वास्थ्य मानक और सुरक्षा इन चीतों के आयात से पहले दक्षिण अफ्रीका में व्यापक स्वास्थ्य जांच और प्रारंभिक संगरोध की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके अलावा, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत आवश्यक विनियामक मंजूरी और भारत के पशु संगरोध अधिकारियों से अनुमति ली गई। मंत्री ने निर्देश दिया है कि अनिवार्य 30 दिनों की संगरोध अवधि के दौरान बन्नेरघट्टा जैविक उद्यान के पशु चिकित्सक और वन अधिकारी उनके स्वास्थ्य और आहार की सख्त निगरानी करें।

हालांकि ये चीते जंगली पुनरुद्धार परियोजना का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि यह कदम सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने और वैज्ञानिक अनुसंधान में सहायक होगा। बन्नेरघट्टा पार्क में चीतों के आने से यहाँ की जैव-विविधता और समृद्ध होगी। यह पार्क वर्तमान में देश के उन चुनिंदा संस्थानों में से एक है जहाँ मांसाहारी जीवों का घनत्व सबसे अधिक है। चीतों की मौजूदगी से न केवल पर्यटकों को लुप्त हो चुकी प्रजाति को देखने का अवसर मिलेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।