सूचना के अधिकार से एक नये रहस्य का हुआ खुलासा
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कमोडोर लोकेश बत्रा ने इसे खोजा
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विभाग ने इस बारे में जानकारी दी
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राहुल ने तीन अन्य नाम सुझाये थे
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) के रूप में राज कुमार गोयल की नियुक्ति पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत जारी किए गए बैठक के विवरण (मिनट्स) के अनुसार, राहुल गांधी ने इस पद के लिए आईएएस सुमिता डावरा, न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और प्रोफेसर फैजान मुस्तफा के नामों का सुझाव दिया था।
सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा द्वारा दायर एक आरटीआई के जवाब में, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने 10 दिसंबर, 2025 को संसद भवन में हुई बैठक का विवरण साझा किया। यह बैठक मुख्य सूचना आयुक्त और आठ अन्य सूचना आयुक्तों के चयन के लिए आयोजित की गई थी। दूसरी ओर, आधिकारिक सूत्रों ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के उन दावों को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि अंतिम सूची में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के नाम शामिल नहीं थे। सूत्रों के अनुसार, उच्च स्तरीय समिति ने केंद्रीय सूचना आयोग में रिक्तियों को भरने के लिए वंचित वर्गों से संबंधित पांच लोगों के नामों की सिफारिश की है।
10 दिसंबर, 2025 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय चयन समिति की बैठक हुई, जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी सदस्य के रूप में शामिल थे। आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि राहुल गांधी ने सरकार द्वारा प्रस्तावित राज कुमार गोयल के नाम पर आपत्ति जताई। उनके स्थान पर उन्होंने तीन विशिष्ट नामों का प्रस्ताव रखा—प्रशासनिक अनुभव के लिए आईएएस सुमिता डावरा, न्यायिक विशेषज्ञता के लिए पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर, और कानूनी शिक्षाविद् प्रोफेसर फैजान मुस्तफा। राहुल गांधी का तर्क था कि इन नामों से आयोग की निष्पक्षता और बौद्धिक गहराई बढ़ेगी।
वहीं, सरकार की ओर से प्रतिक्रिया देते हुए आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि चयन प्रक्रिया में सामाजिक विविधता का पूरा ध्यान रखा गया है। राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि चयन सूची में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की अनदेखी की गई है। इसके विपरीत, सरकारी सूत्रों का दावा है कि सिफारिश किए गए नामों में से पांच व्यक्ति वंचित और शोषित समुदायों से आते हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम समावेशी शासन की दिशा में एक बड़ा प्रयास है और विपक्ष के दावे निराधार हैं।