अंतर्राष्ट्रीय समर्थन के बिना अल्पसंख्यकों पर मंडराता खतरा
दमिश्कः सीरिया के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कुर्दों द्वारा हासिल की गई स्वायत्तता और अधिकारों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हाल ही में अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच, ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों और कुर्द नेताओं ने इस बात पर चर्चा शुरू कर दी है कि क्या ईरान के कुर्द अल्पसंख्यकों को इस्लामिक गणराज्य की कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर सशस्त्र विद्रोह करना चाहिए। यह बहस उस दीर्घकालिक संघर्ष का हिस्सा है जिसमें मध्य पूर्व के कुर्द—जो ईरान, इराक, तुर्की और सीरिया जैसे देशों में विभाजित हैं—दशकों से राजनीतिक समानता और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं।
सीरिया में जनवरी 2026 में कुर्द नेतृत्व और केंद्र सरकार के बीच हुए समझौतों को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग इसे ऐतिहासिक उपलब्धि मान रहे हैं जो कुर्दों को अभूतपूर्व अधिकार प्रदान करता है, जबकि अन्य इसे विकेंद्रीकृत सीरिया में स्वायत्तता बनाए रखने के लक्ष्य की हार के रूप में देख रहे हैं।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो सीरिया की वर्तमान स्थिति और 1970 के दशक के इराक के बीच खतरनाक समानताएं नजर आती हैं। इराक के कुर्द राष्ट्रवादी आंदोलन का इतिहास गवाह है कि कैसे केंद्रीय सरकारें कमजोर होने पर कुर्दों से वादे करती हैं और मजबूत होते ही उनसे मुकर जाती हैं।
वर्ष 1970 में इराक की तत्कालीन बाथ पार्टी और मुल्ला मुस्तफा बरजानी के नेतृत्व वाली कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच एक समझौता हुआ था। उस समय सद्दाम हुसैन एक युवा नेता के रूप में अपनी सत्ता को मजबूत करने और आंतरिक वैधता हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। ठीक उसी तरह, जैसे दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के पतन के बाद सीरिया में अहमद अल-शरा ने सत्ता संभाली और अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के प्रयास किए। इराक में 1970 का वह समझौता कुछ ही वर्षों में पूरी तरह बिखर गया। इसके बाद 1980 के दशक में बाथ सरकार ने कुर्दों के खिलाफ नरसंहार का रास्ता अपनाया, जिसमें जबरन विस्थापन, सामूहिक हत्याएं और रासायनिक हथियारों के हमले शामिल थे।
इराक का यह कड़वा अनुभव सीरिया के कुर्दों के लिए एक चेतावनी की तरह है। इतिहास स्पष्ट करता है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से निवेशित नहीं रहेगा, तब तक कुर्दों के अधिकार सुरक्षित नहीं रह सकते। सीरिया में अल-शरा सरकार ने भी सत्ता संभालते ही कुर्दों के साथ संघर्ष को खत्म करने को प्राथमिकता दी है, लेकिन यह शांति स्थायी होगी या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है। अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी का अर्थ होगा कि कुर्द एक बार फिर उसी दमनकारी चक्र में फंस सकते हैं जिसका उन्होंने इराक में सामना किया था। अतः, सीरिया में एक निष्पक्ष और न्यायसंगत भविष्य सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक शक्तियों की निरंतर निगरानी और भागीदारी अनिवार्य है।