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सरकार की बेचैनी से पूरी दुनिया को मिली नरवणे के पुस्तक की जानकारी

राहुल गांधी को  रोकने से हुआ यह प्रचार

  • संसद में सत्ता पक्ष ने पूरी ताकत लगा दी

  • बाहर निकलकर राहुल ने बैलून की हवा निकाली

  • इंटरनेट पर यह सूचना अब सबके लिए आम हो गयी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः लोकसभा में राहुल गांधी को बोलने से रोकने की वजह से ही आम जनता का ध्यान उस  तरफ गया, जिस तरफ पहले कोई ध्यान नहीं देता था। राजनाथ सिंह, अमित शाह, निशिकांत दुबे और यहां तक कि ओम बिड़ला भी उन पांच लाइनों को रोकते रहे, जिनके बारे में बाहर निकलकर नेता प्रतिपक्ष ने सब कुछ साफ कर दिया।

इसके बाद से ही अब पत्रिका कैरावान के उस हिस्से को इंटरनेट पर लाखों बार तलाशा गया है, जिसमें चीन के साथ युद्ध की स्थिति में सरकार द्वारा ठोस फैसला नहीं लिये जाने की बात कही गयी है। अब तो इस पर आधारित ए आई वीडियो भी सोशल मीडिया में आ गये हैं, जिसमें जनरल नरवणे अंत में यह कहते हुए सुने जा सकते  है कि अगर युद्ध हुआ तो उनकी जिम्मेदारी और पीछे हटे तब भी उनकी जिम्मेदारी। सत्ता शीर्ष ने जिम्मेदारी टालते हुए मेरे हाथ में एक गर्म आलू थमा दिया था।

पुस्तक का जो हिस्सा प्रकाशित हुआ है, उनका हिंदी अनुवाद इस प्रकार है।

31 अगस्त 2020 की रात 8:15 बजे, भारतीय सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख, लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को एक फोन आया। जो सूचना उन्हें मिली, उसने उनके होश उड़ा दिए। पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला की ओर चीन के चार टैंक, पैदल सेना के साथ, एक ढलान वाले पहाड़ी रास्ते से ऊपर की ओर बढ़ने लगे थे।

जोशी ने तुरंत इसकी सूचना सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी, जो स्थिति की गंभीरता को फौरन भांप गए। चीनी टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय चौकियों से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर थे—यह वही रणनीतिक ऊंचाई थी जिसे भारतीय सेना ने कुछ ही घंटे पहले पीपुल्स लिबरेशन आर्मी  के साथ एक खतरनाक दौड़ में जीता था। वास्तविक नियंत्रण रेखा के इस विवादित क्षेत्र में, ऊंचाई का हर एक मीटर रणनीतिक दबदबे का प्रतीक होता है।

भारतीय सैनिकों ने चेतावनी के तौर पर एक रोशनी वाला गोला दागा, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। चीनी सैनिक लगातार आगे बढ़ते रहे। जनरल नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को घबराहट में फोन करना शुरू किया, जिनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, सीडीएस जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल थे। नरवणे अपनी अभी तक अप्रकाशित संस्मरण, फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में लिखते हैं, मेरा हर किसी से एक ही सवाल था, मेरे लिए क्या आदेश हैं?

हालात तेजी से बिगड़ रहे थे और स्पष्टता की सख्त जरूरत थी। मौजूदा प्रोटोकॉल के अनुसार, नरवणे के पास स्पष्ट आदेश थे कि जब तक शीर्ष स्तर से मंजूरी न मिले, गोली न चलाई जाए। लेकिन उनके वरिष्ठों ने कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया। समय बीतता जा रहा था। रात 9:10 बजे जोशी ने फिर फोन किया—चीनी टैंक अब दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे। रात 9:25 बजे नरवणे ने फिर से राजनाथ सिंह को फोन कर स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। काफी देर बाद राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी के हवाले से उन्हें कहा कि उन्हें खुद जो उचित लगे वह करें। यानी सत्ता शीर्ष ने इस पर अपना कोई फैसला नहीं लिया था। मजेदार बात यह है कि पुस्तक लिखी जा चुकी है पर प्रकाशक को भारत सरकार ने इसके प्रकाशन की अनुमति अब तक नहीं दी है।