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भाजपा अब पूर्व कांग्रेसियों की पार्टी हो गयी

असम चुनाव में दलबदल की राजनीति और चुनावी बिसात

  • सभी बड़े भाजपा नेता पूर्व कांग्रेसी

  • असम की लगाम प्रियंका के हाथ में

  • कांग्रेस ने बड़ा गठबंधन खड़ा किया है

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटीः असम विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। इस बार का चुनाव दलबदल, संगठनात्मक मजबूती और बाहरी राज्यों के दिग्गजों की सक्रियता के कारण बेहद दिलचस्प हो गया है।

असम की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा भाजपा के कांग्रेसीकरण को लेकर है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष देबब्रत सैकिया ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए इसे कांग्रेस के पूर्व नेताओं की पार्टी करार दिया है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा खुद 2015 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे और उनके साथ 9 विधायक भी आए थे। हाल ही में असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा का भाजपा में शामिल होना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। जयंता मल्ला बरुआ और पीयूष हजारिका जैसे कई पूर्व कांग्रेसी नेता आज भाजपा सरकार में प्रभावशाली मंत्री हैं।

दूसरी ओर, कांग्रेस अपनी जमीन बचाने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रही है। प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई ने स्पष्ट किया है कि उम्मीदवारों की पहली सूची इसी महीने के अंत तक जारी हो सकती है। मार्च के पहले सप्ताह तक करीब 80 सीटों पर नाम तय कर लिए जाएंगे। प्रियंका गांधी खुद स्क्रीनिंग कमेटी की चेयरपर्सन के रूप में असम का दौरा कर रही हैं, जहाँ वे जिला अध्यक्षों और बूथ स्तर के नेताओं के साथ समीक्षा बैठकें करेंगी। कांग्रेस ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जैसे दिग्गजों को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।

भाजपा को टक्कर देने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में सीपीएम, रायजोर दल और एजेपी समेत कई दलों का एक बड़ा गठबंधन मैदान में है। वहीं, भाजपा ने अपनी चुनावी कमान संभालने के लिए बाहरी राज्यों के अनुभवी नेताओं को उतारा है। हरियाणा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली ने पूर्व मंत्रियों और सांसदों सहित 24 दिग्गज नेताओं की ड्यूटी असम में लगाई है। इनमें जेपी दलाल और सुनीता दुग्गल जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

असम की 126 सीटों पर मार्च-अप्रैल में होने वाले इन चुनावों में फिलहाल भाजपा 64 विधायकों के साथ मजबूत स्थिति में है, लेकिन विपक्षी गठबंधन और दलबदल की लहर ने मुकाबले को कांटे का बना दिया है।