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संसद के मानसून सत्र में घमासान के आसार

सरकार की मंशा अपन  विधेयकों को पारित कराने पर लेकिन

  • विपक्ष के पास अनेक हथियार

  • नीट और एनटीए शीर्ष पर है

  • सरकार का लक्ष्य विधायी कार्य

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः संसद का आगामी मानसून सत्र इस बार बेहद हंगामेदार और टकराव से भरा होने की उम्मीद है। देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए विपक्षी गठबंधन ने सरकार को चौतरफा घेरने के लिए रणनीतिक रूप से कई बड़े और जनहित से जुड़े मुद्दों को शॉर्टलिस्ट किया है। दोनों पक्षों के बीच इस बार सदन के भीतर तीखी बहस होना तय माना जा रहा है।

विपक्ष की इस रणनीति में सबसे ऊपर मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी में कथित अनियमितताएं, पेपर लीक के गंभीर आरोप और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की संपूर्ण कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करना है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार देश के लाखों छात्रों के भविष्य और उनकी वर्षों की मेहनत के साथ खिलवाड़ कर रही है। इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए विपक्षी दल संसद में बिना किसी देरी के कार्यस्थगन प्रस्ताव लाकर इस पर विस्तृत और सीधी चर्चा की मांग पर अड़े हुए हैं।

इसके साथ ही, राजनीतिक और धार्मिक रूप से संवेदनशील अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय लेन-देन, भूमि खरीद और निर्माण कार्यों में कथित गड़बड़ियों तथा भ्रष्टाचार का मुद्दा भी संसद में पूरी तरह गरमाने वाला है। विपक्ष इस मामले में केंद्र सरकार की जवाबदेही तय करने और एक श्वेत पत्र जारी करने की मांग कर रहा है।

दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष (एनडीए) ने भी विपक्ष के इन तीखे हमलों को नाकाम करने और पलटवार करने के लिए अपनी एक मजबूत जवाबी रणनीति तैयार की है। संसदीय कार्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार सरकार सभी निर्धारित विधायी कार्यों और महत्वपूर्ण विधेयकों को समय पर पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले हर सवाल का तथ्यों और आंकड़ों के साथ प्रामाणिक व तार्किक जवाब देने की तैयारी की गई है। सरकार का प्रयास रहेगा कि हंगामे के बीच भी सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाई जा सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सत्र में विधायी कामकाज और नए कानूनों को पारित करने से ज्यादा दोनों पक्षों के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी, नारेबाजी और गतिरोध देखने को मिल सकता है। विपक्ष के आक्रामक रुख और सरकार के कड़े रुख के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर होने वाली सार्थक चर्चा प्रभावित होने की आशंका है। कुल मिलाकर, यह मानसून सत्र लोकतांत्रिक बहसों से ज्यादा राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बनने की ओर अग्रसर है।