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जम्मू-कश्मीर के बारामूला में भूकंप

सूचना पाते ही राज्य प्रशासन हर स्तर पर सतर्क हुआ

  • यह पहले से ही संवेदनशील इलाका

  • एलजी से गहन सर्वेक्षण की अपील

  • दीर्घकालीन योजना पर भी काम हो

राष्ट्रीय खबर

श्रीनगरः आज सुबह जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले और उसके आस-पास के मैदानी व पहाड़ी इलाकों में रिक्टर स्केल पर 3.6 तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए। यद्यपि भूकंप की तीव्रता अपेक्षाकृत कम थी और इसका केंद्र जमीन के भीतर कम गहराई पर स्थित था, लेकिन सीमावर्ती और भू-वैज्ञानिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण प्रशासनिक हलकों में तुरंत हलचल मच गई। घटना के तुरंत बाद राज्य आपदा प्रबंधन टीमों और स्थानीय प्रशासन को हाई अलर्ट पर रख दिया गया।

प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जारी शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, इस भूकंप से किसी भी तरह के जान-माल के नुकसान या बड़े बुनियादी ढांचे (जैसे सड़कों, पुलों और बिजली लाइनों) के ढहने की कोई खबर नहीं है। हालांकि, इस प्राकृतिक घटना ने कश्मीर घाटी में आपदा तैयारियों और सुरक्षा मानकों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक व सामाजिक चर्चा को जन्म दे दिया है।

प्रशासन ने घाटी के विभिन्न हिस्सों में त्वरित निगरानी के लिए आपातकालीन नियंत्रण कक्ष स्थापित कर दिए गए हैं। स्थानीय प्रशासन ने जनता से किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न देने और पैनिक (घबराहट) न होने की अपील की है। इस घटना के बाद स्थानीय राजनीतिक दलों और घाटी के प्रमुख नेताओं ने उपराज्यपाल प्रशासन से पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में तुरंत एक व्यापक सुरक्षा ऑडिट करवाने की अपील की है। नेताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि पूरी कश्मीर घाटी भूकंपीय संवेदनशीलता के मामले में ज़ोन 5 में आती है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अत्यधिक खतरनाक और विनाशकारी भूकंपों के प्रति संवेदनशील माना जाता है।

नेताओं का कहना है कि सरकार को केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव कार्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके बजाय, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भूकंप-रोधी निर्माण तकनीकों को अनिवार्य बनाने और त्वरित चिकित्सा सहायता की स्थायी व्यवस्था करने की नीति अपनानी चाहिए।

बारामूला में आए इस कम तीव्रता के भूकंप ने एक बार फिर यह चेतावनी दी है कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य के विकास, बुनियादी ढांचे के निर्माण और सुरक्षा नीतियों में पर्यावरण संरक्षण तथा आपदा प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता देना बेहद अनिवार्य है। केवल बेहतर पूर्व-तैयारी और मजबूत बुनियादी ढांचे के बल पर ही इस अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र को भविष्य के बड़े खतरों से सुरक्षित रखा जा सकता है।