नेता तो नेता पब्लिक भी अजीब तरीके से नाच रही है। पता नहीं सभी की अपनी अपनी समझ को क्या हो गया है। सामान्य घटनाक्रमों को भी वे अपने खुद के दिमाग से समझ क्यों नहीं पाते। इंदौर में दूषित पानी पीकर कई लोग मर गये और किसी को जिम्मेदार ठहराने के बदले इसकी टोपी उसके सर का खेल चालू हो गया। वइसे सीएम साहब भी चुप्पी साधे हुए थे लेकिन राहुल गांधी ने पानी के बदले जहर पी रहे हैं का बयान क्या दे दिया, टेंशन हो गया।
इससे पहले अरावली की घाटी पर आये फैसले पर पता नहीं कैसी कैसी अजीब दलीलें दी गयी और उस फैसले को सही ठहराने की पूरी कोशिश की गयी, जिससे पूरी अरावटी पहाड़ियों के अस्तित्व पर ही संकट आ जाता। वे लोग अब दिल्ली के प्रदूषण पर कुछ नहीं बोलते जो पहले अरविंद केजरीवाल की सरकार को पानी पी पीकर कोसते थे। वइसे पता नहीं आपलोगों ने गौर किया है अथवा नहीं आज कल के टीवी बहस में मुद्दों पर एकरूपता नहीं है जो कभी हीरेन जोशी के समय दिखा करती थी। शायद हर रोज व्हाट्सएप पर संदेश आने का सिलसिला बाधित हो गया है।
न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद पर बयान क्या दिया, लोग तुरंत ही उसे बांग्लादेश के बारे में नसीहत देने लगे। अरे भाई उनकी मां भारतीय हैं तो उनका जुड़ाव भारत से अधिक होगा, यह स्वाभाविक है। बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर बयान देने वाले पहलगाम के मुद्दे पर चुप्पी साध गये थे। क्यों पहलगाम में क्या किसी दूसरे देश के नागरिक मारे गये थे। अब इंदौर की मौतों पर भी हर वक्त बयान देने वालों की जुबान पर ताला क्यों लगा है, यह बड़ा सवाल है।
इसी बात पर एक चर्चित गीत की याद आ रही है। अपने समय के सुपरहिट फिल्म शोले का यह गीत कभी न कभी हर किसी की कानों में सुनाई पड़ा होगा। इस गीत को लिखा है आनंद बक्क्षी ने और संगीत में ढाला है आर डी बर्मन ने। गीत को बोल कुछ इस तरह हैं।
हो… जब तक है जान, मैं नाचूंगी हाँ जब तक है जान, मैं नाचूंगी
गैरों के डगर पे हमको गिराना जहर पिला के जाम पिलाना
हमको तो आता है, कसम निभाना अपने ही लहू से आग बुझाना हो
जब तक है जान, मैं नाचूंगी हाँ जब तक है जान, मैं नाचूंगी
काँच के टुकड़ों पे भी नाच के दिखाऊंगी
हाँ अपनी वफ़ा का मैं आज़माऊँगी
मौत के साए में भी गाके सुनाऊँगी
ज़ुल्म की जंजीरें मैं खनकाऊँगी
ओ… जब तक है जान, मैं नाचूंगी हाँ जब तक है जान, मैं नाचूंगी
प्यार में क्या-क्या सितम हम पे हुए हैं
कितने ही तीर यहाँ दिल पे सहे हैं
दुनिया के लोग तो पत्थर हुए हैं
साहिल पे खड़े-खड़े सब देख रहे हैं हो
जब तक है जान, मैं नाचूंगी हाँ जब तक है जान, मैं नाचूंगी
टूट भी जाए अगर दिल का खिलौना
याद में किसी की फिर भी न रोना
प्यार की राहों में कभी न डरना जीना है
यहाँ तो शान से मरना हो
जब तक है जान, मैं नाचूंगी हाँ जब तक है जान, मैं नाचूंगी
हाँ जब तक है जान, मैं नाचूंगी…
इसलिए सभी अपनी अपनी जान बचाने के लिए अगर नाच रहे हैं तो इसमें कोई बुरी बात नहीं है पर किसी और की साख बचाने के लिए अगर नाच रहे हैं तो आज नहीं तो कल देश का मैंगो मैन आपसे सवाल पूछ ही लेगा। धीरे धीरे सरकार से सवाल पूछने की प्रवृत्ति फिर से पनपने लगी है। मोदी सरकार ने बड़ी कोशिश के साथ इस प्रथा को लगभग समाप्त कर ही दिया था।
बिना प्रेस कांफ्रेंस के धड़ल्ले से सरकार चला रहे हैं और मीडिया है कि बार बार सिर्फ विपक्ष से ही सवाल पूछने पर बिजी रहती है। पहले तो सिर्फ राहुल गांधी और अखिलेश यादव ही सवाल करते थे। बाद में तेजस्वी यादव भी इस कतार में शामिल हो गये। अब पश्चिम बंगाल के टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने शायद सभी को पीछे छोड़ दिया है।
वह वोट चोरी के मुद्दों पर जिन मुद्दों का उल्लेख कर रहे हैं, वे सिर्फ चुनाव आयोग ही नहीं बल्कि भाजपा पर भी भारी पड़ने लगे हैं। चुनाव आयोग के कार्यालय के ठीक बाहर प्रेस कांफ्रेंस ने अभिषेक ने जिस तरीके से बेचारे ज्ञानेश कुमार की फजीहत कर दी है, वह याद रखा जाएगा। लेकिन कुछ लोग मान रहे हैं कि सरकार अगर किसी वजह से बदल गयी और सत्ता का कब्जा गुजरात लॉबी के हाथ से निकल गया तो बेचारे ज्ञानेश कुमार क्या होगा। पहले वाले चुनाव आयुक्त राजीव कुमार अब भी जनता की नजरों से ओझल ही चल रहे हैं।