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प्राचीन काल की तक्षशिला के होने का और प्रमाण मिला

कुषाण कालीन मुद्राएं और बेशकीमती पत्थर मिली

इस्लामाबादः पाकिस्तान के पुरातात्विक विभाग ने ऐतिहासिक शहर तक्षशिला के पास स्थित एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल पर खुदाई के दौरान अद्भुत सफलता प्राप्त की है। विशेषज्ञों ने भिर टीले नामक स्थल से प्राचीन सजावटी पत्थर और दुर्लभ सिक्के बरामद किए हैं, जो इस क्षेत्र के प्राचीन शहरी बंदोबस्त और व्यापारिक इतिहास पर नई रोशनी डालते हैं।

यह खोज पिछले एक दशक की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक उपलब्धियों में से एक मानी जा रही है। खुदाई के दौरान मिले सामानों में छठी शताब्दी ईसा पूर्व के लापिस लाजुली के टुकड़े और दूसरी शताब्दी ईस्वी के कुषाण कालीन तांबे के सिक्के शामिल हैं।

पंजाब पुरातत्व विभाग के उपनिदेशक आसिम डोगर ने बताया कि बरामद किए गए सिक्कों पर सम्राट वासुदेव की छवि अंकित है। वासुदेव को कुषाण राजवंश का अंतिम महान शासक माना जाता है। सिक्कों के अग्र भाग पर सम्राट को मध्य एशियाई पोशाक में दिखाया गया है, जबकि पिछले भाग पर एक देवी की आकृति है।

यह चित्रण कुषाण काल की धार्मिक सहिष्णुता और बहुलवाद का जीवंत प्रमाण है, जहाँ बौद्ध, ग्रीक और हिंदू देवी-देवताओं का समान रूप से सम्मान किया जाता था। इन सिक्कों के विश्लेषण के लिए पेशावर विश्वविद्यालय के मुद्राशास्त्रियों की मदद ली गई है, जिन्होंने इनकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता की पुष्टि की है।

सिक्कों के अलावा, गहरे नीले रंग के लापिस लाजुली पत्थरों का मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पत्थर उस समय केवल वर्तमान अफगानिस्तान के बदख्शां क्षेत्र में पाया जाता था। तक्षशिला में इसकी उपस्थिति यह साबित करती है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भी यह शहर एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र था, जिसके संबंध मध्य एशिया और सुदूर क्षेत्रों से थे। तक्षशिला अपनी प्राचीन यूनिवर्सिटी और गांधार कला के लिए प्रसिद्ध रहा है, जहाँ ग्रीक, रोमन और भारतीय संस्कृतियों का संगम हुआ था। इस नई खोज से यह स्पष्ट होता है कि कुषाण काल में तक्षशिला केवल बौद्ध धर्म का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक समृद्ध आर्थिक और बौद्धिक महानगर भी था।