जन-आंदोलनों से घिरी यूरोप से क्या वैश्विक संदेश है
नव-उदारवाद केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक अवधारणा भी है। इसका मूल मंत्र यह है कि मुक्त बाजार ही हर चीज़ का निर्धारक है और सरकार की भूमिका को कम किया जाना चाहिए। आज पूरा यूरोप जन-आंदोलनों की चपेट में है। फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, इटली और कई अन्य देश इसकी आंच महसूस कर रहे हैं। क्या नव-उदारवाद अब पूंजीवाद की रक्षा करने में असमर्थ साबित हो रहा है?
छह देश और छह अलग रंगों की सरकारें हैं, लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों की मांगें और उनका स्वरूप लगभग एक जैसा है। अब यह कहना मुश्किल है कि ये प्रदर्शन केवल छह देशों तक ही सीमित हैं, क्योंकि रोजाना इसमें नए-नए देश जुड़ते जा रहे हैं। इस बीच सर्बिया के पुराने शासन का छात्रों ने अंत भी कर दिया। शुरुआत फ्रांस से हुई थी, जिसके बाद स्पेन, पुर्तगाल, इटली, अल्बानिया और बेल्जियम भी इसमें शामिल हो गए।
धीरे-धीरे यह आग जर्मनी, चेक गणराज्य और ग्रीस समेत अन्य जगहों पर भी फैल रही है। फ्रांस में सबसे पहले स्कूली छात्रों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया, जिन्हें जेन अल्फा कहा जाता है। उनकी मांग थी कि स्कूलों में शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए और स्कूल की इमारतों सहित अन्य बुनियादी ढांचे में सुधार किया जाए। कुछ ही दिनों में इसमें येलो वेस्ट प्रदर्शनकारी भी शामिल हो गए।
पिछले कुछ दिनों में फ्रांस के विभिन्न शहरों में जिस तरह की हिंसा देखने को मिली है, वह पूरी तरह से अकल्पनीय थी। लिमोज में ऐतिहासिक सिटी हॉल को आग के हवाले कर दिया गया, जिसे कोई भी स्वीकार नहीं कर पा रहा है। यूरोप के जिन अन्य देशों में यह विरोध प्रदर्शन फैला है, वहां भी कई जगहों पर हिंसक घटनाएं सामने आ रही हैं। स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में प्रदर्शनकारी सड़कों पर छोटे-छोटे तंबू गाड़कर बैठ गए हैं।
इन देशों में प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग किफायती आवास उपलब्ध कराने की है। कुल मिलाकर, सभी देशों के नागरिकों के प्रदर्शनों से जो प्रमुख मांगें उभर कर सामने आ रही हैं, वे हैं- छंटनी पर रोक लगे, महंगाई नियंत्रित की जाए, पेंशन बढ़ाई जाए, स्वास्थ्य और शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए, भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार सख्त रुख अपनाए और पर्यावरण की रक्षा की जाए।
इस मांग के पीछे का एक सच यह भी है कि सरकार के गैर उत्पादक खर्च में कटौती के बिना जनकल्याण संभव नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का मानना है कि प्रवासियों को नियंत्रित करने में यूरोप की विफलता ही इन प्रदर्शनों की मुख्य वजह है। ट्रम्प ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उनकी सलाह न मानकर और सीमाएं बंद न करके देश को बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया है।
स्पेन और इटली के मामले में भी उनका यही दृष्टिकोण है। ट्रम्प समर्थकों का तर्क है कि राष्ट्रीय फुटबॉल टीमों के लिए खिलाड़ी मुहैया कराने जैसे कुछेक कामों को छोड़कर देश के निर्माण में इन प्रवासियों की कोई सार्थक भूमिका नहीं होती है, फिर भी हर तरह के विरोध, प्रदर्शन, हिंसा और दंगों में इन्हें ही सबसे आगे देखा जाता है। दक्षिणपंथियों के इस दावे को यूरोप के वामपंथी या मानवाधिकार संगठनों द्वारा तनिक भी महत्व नहीं दिया जा रहा है, जो कि स्वाभाविक है।
वास्तव में, फ्रांस समेत किसी भी देश के इन प्रदर्शनों में प्रवासियों को उस तरह से आगे नहीं देखा जा रहा है। इस बात का भी कोई आधार नहीं है कि दंगाइयों के समूहों में मुख्य रूप से अश्वेत प्रवासी ही शामिल हैं। ट्रम्प समर्थकों के इस अति-सरलीकृत सिद्धांत पर कि प्रवासियों को देश से बाहर करने से सारी समस्याएं हल हो जाएंगी, यूरोप की सरकारें भी विश्वास नहीं कर रही हैं।
इसकी वजह यह है कि यूरोप के हर देश के श्रम बाजार में प्रवासियों की एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसे एक बड़े वर्ग के श्वेत लोग भी स्वीकार करते हैं। यह बात लगातार सामने आ रही है कि इस बार का जन-विद्रोह एक बार फिर नव-उदारवादी व्यवस्था की विफलता को उजागर कर रहा है। जिन आर्थिक और राजनीतिक मांगों को लेकर सभी देशों के नागरिक सड़कों पर उतरे हैं, उनका मूल सार यह है कि सरकार को एक बड़ी भूमिका के साथ आगे आना होगा। लाखों लोगों के ये विरोध प्रदर्शन इस सच्चाई को सामने ला रहे हैं कि बाजार अर्थव्यवस्था धन का न्यायसंगत वितरण करने में पूरी तरह असफल साबित हो रही है। इस व्यवस्था में फालतू का सरकारी खर्च और बिना काम के बेहिसाव वेतन और भत्ता पाने वालों का बोझ भी जनता पर है,जिसे अब जनता और उठाना नहीं चाहती है। वह चाहती है कि कर के पैसे से जनता का भला हो।