दो दशक पुराने मामले को सात जजों की पीठ ने निपटाया
बीस साल से अधिक चला यह मामला
संविधान पीठ ने आधे घंटे में निपटाया
संदर्भ को ही निष्प्रभावी करार दिया गया
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट में 20 साल से अधिक समय से लंबित विधायी विशेषाधिकार बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला मंगलवार को महज आधे घंटे के भीतर समाप्त हो गया। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस संदर्भ को निष्प्रभावी मानते हुए खारिज कर दिया।
यह पूरा मामला साल 2003 का है, जब तमिलनाडु विधानसभा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की आलोचना करने वाले द हिंदू अखबार के संपादकीय पर कार्रवाई करते हुए इसके संपादकों को गिरफ्तार करने का प्रस्ताव पारित किया था। अखबार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मामले की सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु विधानसभा के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने पीठ को अवगत कराया कि संबंधित प्रस्ताव को 2004 में ही वापस ले लिया गया था। हालांकि, यह तथ्य सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में नहीं आ पाया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि चूंकि विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पहले ही वापस लिया जा चुका है, इसलिए लंबी और अकादमिक सुनवाई का कोई औचित्य नहीं बनता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह बिना किसी ठोस कारण के लंबे शैक्षणिक विमर्श में नहीं पड़ना चाहती, खासकर तब जब कई अन्य जरूरी मामले लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं के सुझाव पर अदालत ने कानून के बड़े और महत्वपूर्ण प्रश्नों को भविष्य के किसी उपयुक्त मामले के लिए खुला छोड़ दिया।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि अदालत ने दो रिकॉर्ड बनाए हैं—सबसे छोटी सुनवाई और सात-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सबसे त्वरित फैसला। इस तरह, दो दशकों से अधिक समय से चले आ रहे इस कानूनी संघर्ष का अंत हो गया, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता और विधायिका के विशेषाधिकारों के बीच संतुलन का मुद्दा शामिल था।