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उत्तराखंड से पूरी तरह गायब हो सकता है ढोल

विशेषज्ञों ने तमाम अध्ययनों के बाद खतरे से आगाह किया

पहले कई जंगलों में बहुतायत थी

हाल के दिनों में नजर नहीं आये

झूंड में शिकार करते हैं ये कुत्ते

राष्ट्रीय खबर

देहरादूनः उत्तराखंड के जंगलों से एशियाई जंगली कुत्ता यानी ढोल विलुप्त होने की कगार पर पहुँच सकता है या पूरी तरह गायब हो चुका है। जिन क्षेत्रों में कभी इसकी मौजूदगी दर्ज की जाती थी, वहाँ हाल के दिनों में इसकी कोई भी आधिकारिक पुष्टि या पक्का सुराग नहीं मिला है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि ढोल की घटती संख्या जैव विविधता संरक्षण और वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए एक बेहद गंभीर चिंता का विषय है।

वन्यजीव पर्यवेक्षकों के अनुसार, लगभग 15 से 20 साल पहले राजाजी टाइगर रिजर्व के धौल खंड से लेकर कॉर्बेट के जंगलों तक ढोल आसानी से देखे जाते थे। रिपोर्ट बताती हैं कि 1980 के दशक तक धौल खंड में इनकी संख्या काफी अच्छी थी। ये झुंड में रहते थे और चीतल, सांभर तथा अन्य शाकाहारी जानवरों का शिकार करते थे। हालांकि, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, देहरादून के शोधकर्ताओं द्वारा 2018 में किए गए एक अध्ययन के दौरान उत्तरकाशी जिले के खेड़ा ताल क्षेत्र में कैमरा-ट्रैप के जरिए इनकी तस्वीरें जरूर कैद की गई थीं, जिसका शोध पत्र मैमेलिया पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद से उन क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी का कोई नया पक्का प्रमाण सामने नहीं आया है।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की 2018 की रिपोर्ट में भी इस प्रजाति के ऐतिहासिक दायरे में लगातार आ रही गिरावट का जिक्र किया गया था। विशेषज्ञों के मुताबिक, आवास का नुकसान, शिकार के लिए जीवों की कमी और जंगलों के पास बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं। वैसे तो ढोल देश के अन्य हिस्सों जैसे पश्चिमी व पूर्वी घाट, मध्य भारत और पूर्वोत्तर राज्यों में पाए जाते हैं, लेकिन हिमालयी क्षेत्रों में इनकी आबादी काफी छोटी और बिखरी हुई है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने इस प्रजाति को लुप्तप्राय श्रेणी में रखा है।
वन विभाग के पूर्व उपनिदेशक और वन्यजीव विशेषज्ञ रंगनाथ पांडे ने बताया, ढोल अत्यधिक सामाजिक प्राणी हैं जो झुंड में शिकार करते हैं। इनका मुख्य भोजन चीतल, सांभर और अन्य मध्यम आकार के खुर वाले जानवर होते हैं। उन्होंने आवास विखंडन, मानवीय अशांति और पालतू कुत्तों से फैलने वाली बीमारियों को ढोल के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। सड़कों और बस्तियों के बढ़ने से वन्यजीवों का आवागमन बाधित होता है, जबकि आवारा कुत्तों के संपर्क में आने से ढोलों में रेबीज और कैनाइन डिस्टेंपर जैसी घातक बीमारियाँ फैलने का खतरा रहता है।
डब्ल्यूआईआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक बिलाल हबीब ने चेतावनी दी है कि ढोल उत्तराखंड से पूरी तरह गायब हो चुके हैं और इन्हें वापस लाने के लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ढोल पारिस्थितिकी तंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो उत्तराखंड के जंगलों में 15-20 साल पहले तक मौजूद थे।