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लोकतंत्र में असहमति को अस्वीकार करना गलत

कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं की हिरासत और हिरासत में एक हफ़्ते बिताने के बाद उनकी रिहाई कई ऐसे सवाल खड़े करती है, जो दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक अनाधिकृत विरोध-प्रदर्शन के दायरे से कहीं आगे जाते हैं। मूल मुद्दा एक ऐसे लोकतंत्र में निरोधात्मक कानून के इस्तेमाल का है, जहाँ असहमति व्यक्त करने के अधिकार की संवैधानिक गारंटी तो प्राप्त है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इस पर लगातार विवाद बना रहता है।

सौरव दास और आशुतोष रांका को इससे पहले दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था और खबर है कि उनसे पचास-पचास हजार रुपये के शांति बांड भरने के लिए कहा गया था। बाद में, जब उन्होंने जंतर-मंतर पर लगे बैरिकेड्स को पार किया और राष्ट्रीय ध्वज फहराया, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गौरतलब है कि जंतर-मंतर को हाल ही में निर्धारित विरोध स्थलों की सूची से हटा दिया गया है।

पुलिस ने उनके इस व्यवहार को पूर्व में दिए गए वचनों या मुचलके का उल्लंघन माना। दूसरी ओर, उनके वकीलों ने इस पूरी कानूनी प्रक्रिया की वैधता को अदालत में चुनौती दी है। निरोधात्मक कार्रवाई अपने आप में स्वाभाविक रूप से आपत्तिजनक नहीं होती है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत, यदि सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका के पर्याप्त आधार मौजूद हों, तो एक कार्यपालक मजिस्ट्रेट शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा या मुचलका माँग सकता है।

लेकिन इस शक्ति का अर्थ केवल इसलिए राजनीतिक लामबंदी को समय से पहले रोकना या दबाना नहीं है कि इससे अधिकारियों को असुविधा हो सकती है। इस शक्ति का प्रयोग विश्वसनीय आधारों पर टिका होना चाहिए और इसे पहचाने गए खतरे के अनुपात में ही लागू किया जाना चाहिए। यहाँ सबसे अहम सवाल यह है कि क्या शुरुआती बांड कानूनी रूप से सही तरीके से थोपे गए थे और क्या उसके बाद के आचरण ने इस प्रकार की हिरासत को जायज ठहराया। किसी प्रतिबंधित स्थल के बैरिकेड को पार करके अंदर घुसना निश्चित रूप से कानूनी परिणामों को आमंत्रित कर सकता है।

लेकिन राष्ट्रीय ध्वज फहराना और चुनाव आयोग की आलोचना करना, अपने आप में शांति भंग करने का आधार नहीं बन सकता। न ही किसी बांड के कथित उल्लंघन से लंबे समय तक हिरासत में रखने को स्वतः ही सही ठहराया जा सकता है। वास्तव में अधिकारियों ने कानून के दायरे में रहकर काम किया है या नहीं, इसका निर्णय केवल वास्तविक आदेशों और उनके समर्थन में पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा अव्यवस्था को रोकने और वैध विरोध-प्रदर्शन को दबाने के बीच के बारीक अंतर को स्वीकार किया है। मधु लिमये बनाम उप-मंडलीय मजिस्ट्रेट (1970) मामले में, शीर्ष अदालत ने संवैधानिक और प्रक्रियात्मक सीमाओं के भीतर निरोधात्मक कार्यवाहियों की वैधता को बरकरार रखा था। इसी तरह, मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) के मामले में, अदालत ने विशेष रूप से जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के संदर्भ में, शांतिपूर्ण सभा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की बात कही थी।
किसी स्थान को निर्धारित विरोध स्थलों की सूची से हटा देने से केवल यह तय हो सकता है कि प्रदर्शन कहाँ होंगे; इससे शांतिपूर्वक एकत्र होने का संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर के जरिए अयोग्य, मृत और दोहराव वाले नामों को मतदाता सूची से हटाया जा रहा है, जबकि आलोचकों को डर है कि इसमें योग्य मतदाताओं को भी बाहर किया जा सकता है।

ऐसे आरोपों के लिए पारदर्शिता और सत्यापन योग्य साक्ष्यों की आवश्यकता होती है, न कि उन्हें स्वतः ही स्वीकार या खारिज कर दिया जाना चाहिए। इस आंदोलन से जुड़े लोगों को भी अपने दावों को तथ्यों के साथ साबित करना होगा और कानून द्वारा तय की गई सीमाओं का सम्मान करना होगा। ठीक उसी तरह, अधिकारियों को भी यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उनकी कार्रवाई क्यों आवश्यक थी, न कि केवल ऐसे निरोधात्मक उपायों पर निर्भर रहना चाहिए जो जायज विपक्ष को डराने या दबाने का जोखिम पैदा करते हैं।

कार्यकर्ताओं की रिहाई से उनकी तात्कालिक हिरासत का मामला तो हल हो जाता है, लेकिन इससे जुड़ा बड़ा विवाद खत्म नहीं होता। उनकी कानूनी चुनौती से यह स्पष्ट होना चाहिए कि बांड और उसके बाद की गई हिरासत कानून के अनुकूल थी या नहीं। एक लोकतंत्र हर प्रदर्शनकारी को हर सार्वजनिक स्थान तक अप्रतिबंधित पहुँच की गारंटी नहीं दे सकता। हालाँकि, इसे यह सुनिश्चित अवश्य करना होगा कि पाबंदियाँ असुविधाजनक आवाज़ों को चुप कराने का साधन न बन जाएँ। वरना हम भी धीरे धीरे पाकिस्तान के जैसा बनते जा रहे हैं, जहां की सरकार इमरान खान को जेल के अंदर ही रखना चाहती है।