जलवायु परिवर्तन को देखते हुए इंडोनेशिया ने फैसला बदला
जकार्ताः इंडोनेशियाई सरकार द्वारा देश के विशाल वन क्षेत्रों को चावल के खेतों में परिवर्तित करने की महत्वाकांक्षी योजना को रद्द करने का फैसला पर्यावरण और वैश्विक जलवायु संरक्षण के दृष्टिकोण से एक अत्यंत दूरगामी और ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश इंडोनेशिया, जो लंबे समय से चावल के भारी आयात पर निर्भर रहा है, ने हाल के वर्षों में खाद्य सुरक्षा हासिल करने के उद्देश्य से एक व्यापक योजना बनाई थी। इस योजना के तहत देश के लगभग 74 लाख एकड़ (30 लाख हेक्टेयर से अधिक) समृद्ध और घने वन क्षेत्र को साफ करके वहाँ चावल की खेती शुरू करने का लक्ष्य रखा गया था।
हालाँकि, इंडोनेशियाई राष्ट्रीय खाद्य एजेंसी द्वारा जारी किए गए ताज़ा और आधिकारिक आंकड़ों ने इस दिशा में एक बड़ा मोड़ ला दिया है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 के दौरान देश में कुल 3.83 करोड़ टन चावल का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया, जबकि संपूर्ण देश की वार्षिक घरेलू मांग केवल 3.44 करोड़ टन की थी। इस प्रकार, इंडोनेशिया ने न केवल अपनी राष्ट्रीय मांग को पूरी तरह से आत्मनिर्भर होकर पूरा किया, बल्कि लगभग 39 लाख टन का अधिशेष (सरप्लस) उत्पादन भी हासिल कर लिया। इस ऐतिहासिक सफलता पर खुशी जताते हुए इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने इसे देश की खाद्य स्वतंत्रता और सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण जीत करार दिया।
चावल के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त होते ही इंडोनेशियाई सरकार ने जंगलों की कटाई से जुड़ी इस विवादित परियोजना को तुरंत प्रभाव से रोकने का फैसला किया। देश के विशेष जलवायु दूत हाशिम जोजोहादिकुसुमो—जो राष्ट्रपति प्रबोवो के भाई भी हैं—ने इस निर्णय की व्याख्या करते हुए कहा कि इंडोनेशिया के पास मौजूद विशाल वर्षावन और पीटलैंड्स वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने और वैश्विक तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) को नियंत्रित करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब देश के पास पहले से ही पर्याप्त और अधिशेष खाद्यान्न मौजूद है, तो ऐसे में प्राकृतिक वनों को काटकर कृषि भूमि में बदलने का कोई तार्किक या व्यावहारिक औचित्य नहीं रह जाता है।
अब सरकार ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए जंगलों के क्षरण के बजाय सघन कृषि उपायों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया है। इसके तहत इंडोनेशिया और अधिक नए जंगलों को काटने या साफ करने के बजाय पहले से मौजूद कृषि योग्य भूमि पर ही आधुनिक तकनीकों, उन्नत किस्म के बीजों, बेहतर सिंचाई प्रणालियों और वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन के माध्यम से प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने पर जोर देगा।
विश्वभर के पर्यावरणविदों और अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण संगठनों ने इंडोनेशिया के इस दूरदर्शी कदम की जमकर सराहना की है। वैश्विक पर्यावरण संरक्षण संस्था माइटी अर्थ के संस्थापकों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इंडोनेशिया ने पूरी दुनिया के सामने यह अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है कि किस प्रकार कोई देश प्रकृति, जंगलों और जैव विविधता को बिना कोई नुकसान पहुंचाए अपनी खाद्य सुरक्षा को न केवल सुनिश्चित कर सकता है, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।