दिल्ली के एसआईआर में अनेक प्रमुख नाम हटने पर चर्चा
चुनाव आयोग से किया कड़ा सवाल
तार्किक विसंगति कौन तय करता है
47 लाख नाम पहले ही हटा दिये गये
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारत निर्वाचन आयोग से कड़े सवाल किए। अदालत ने यह जानना चाहा कि दिल्ली में चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान तार्किक विसंगतियों की श्रेणी के तहत लोगों को किस आधार पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं। शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अदालत ने चुनाव आयोग को उठाए गए कदमों पर एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही, बिहार और पश्चिम बंगाल के मामलों में दिए गए अपने अंतरिम निर्देशों का पालन करने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें दिल्ली में एसआईआर प्रक्रिया के संचालन के तरीके पर सवाल उठाया गया है। याचिककर्ताओं ने इस बात पर आपत्ति जताई है कि मतदाताओं को बिना किसी विशिष्ट कारण या साक्ष्य को बताए नोटिस थमाए जा रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि मुख्य समस्या सिर्फ नोटिसों की संख्या नहीं है, बल्कि इस बात की स्पष्टता का अभाव है कि मतदाताओं से वास्तव में क्या साबित करने के लिए कहा जा रहा है। उन्होंने बताया कि दिल्ली में जारी मसौदा मतदाता सूची से लगभग 47 लाख नाम हटा दिए गए हैं, जबकि लगभग 33 लाख ऐसे मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए जिनके नाम सूची में बचे हुए थे।
भूषण ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि मतदाता और उनके माता-पिता के बीच उम्र के अंतर का हवाला देकर नोटिस भेजे जा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग के दस्तावेजों में माता-पिता की जानकारी होना अनिवार्य नहीं होता। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जो मतदाता पहले ही अपना फॉर्म और आयु-निवास का प्रमाण दे चुके हैं, उन्हें अतिरिक्त तथ्य साबित करने के लिए क्यों मजबूर किया जाए।
न्यायमूर्ति बागची ने आयोग से यह जांच करने को कहा कि क्या बिना सोचे-समझे नोटिस जारी किए जा रहे हैं और क्या मतदाताओं को नोटिस का कारण स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने भी तार्किक विसंगति श्रेणी के अर्थ और उसकी कार्यप्रणाली को स्पष्ट करने को कहा। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने अदालत को बताया कि हर नोटिस में कारण दिया गया है और मामला उतना गंभीर नहीं है जितना बताया जा रहा है। आयोग ने यह भी आश्वासन दिया कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना एक भी मतदाता का नाम नहीं हटाया जाएगा।