इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की स्कूल में हिजाब पहनने की याचिका: फैसले को चुनौती देगा AIMPLB; कोर्ट बोला- यह अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज स्थित एक निजी स्कूल की 11वीं कक्षा की छात्रा द्वारा स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रही कि हिजाब पहनना इस्लामिक आस्था का ऐसा अनिवार्य व अभिन्न अंग है, जिसके बिना किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान समाप्त हो जाती है। वहीं, इस निर्णय के सामने आने के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने हाईकोर्ट के आदेश को उच्च अदालत में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है।
👩🎓 प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल का मामला: दो सदस्यीय पीठ ने सुनाया फैसला
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती टिप्पणी:
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याचिकाकर्ता का पक्ष: प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल में 11वीं कक्षा में प्रवेश ले रही नाबालिग छात्रा सुकैना रिजवी ने अपनी मां के माध्यम से यह रिट याचिका दायर की थी।
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पीठ की टिप्पणी: न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि छात्रा यह प्रमाणित नहीं कर सकी कि सिर ढकना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है और इसके अभाव में उसकी धार्मिक आस्था खतरे में पड़ जाएगी।
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तस्वीरों का हवाला: अदालत ने पाया कि विभिन्न कक्षाओं की तस्वीरों के अनुसार, याचिकाकर्ता को छोड़कर किसी अन्य छात्रा ने हिजाब नहीं पहना था, यहां तक कि उसी समुदाय की अन्य छात्राएं भी सामान्य स्कूल यूनिफॉर्म में थीं।
🎙️ फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत, हम अदालत जाएंगे: मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का रुख:
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भ्रम की स्थिति: AIMPLB के वरिष्ठ सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि मामले में कुछ भ्रम हुआ है, क्योंकि कुरान और हदीस दोनों में हिजाब का उल्लेख है और यह धार्मिक आचरण का हिस्सा है।
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संविधान प्रदत्त अधिकार: उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन करने की स्वतंत्रता देता है।
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ड्रेस कोड और आस्था: मौलाना ने स्पष्ट किया कि यद्यपि छात्रों को स्कूल के निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करना चाहिए, किंतु धार्मिक कर्तव्यों के निर्वहन के साथ समन्वय बनाने के लिए इस अदालती फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है।
📜 ‘अनिवार्य प्रथा का दावा केवल कथन मात्र, कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया’
अदालत के वैधानिक तर्क:
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साक्ष्य का अभाव: पीठ ने 21 अगस्त के आदेश में रेखांकित किया कि याचिका में हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा बताने के समर्थन में कोई ठोस धार्मिक ग्रंथ या आधिकारिक दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया।
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अनुच्छेद 25 का दायरा: कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दावे को बिना प्रामाणिक तथ्यों और कानूनी आधार के केवल मौखिक दावों पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
🏛️ स्कूल की आंतरिक नीति में दखल नहीं, समानता बनाए रखना उद्देश्य: सरकार व CBSE
राज्य सरकार और बोर्ड की दलीलें:
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राज्य सरकार का तर्क: एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल गिरिजेश कुमार त्रिपाठी ने दलील दी कि संबंधित विद्यालय एक गैर-सहायता प्राप्त निजी संस्थान है। सभी छात्रों में एकरूपता और अनुशासन बनाए रखने के लिए यूनिफॉर्म तय करना स्कूल प्रबंधन की आंतरिक नीति का हिस्सा है।
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मौलिक अधिकारों का हनन नहीं: सरकारी पक्ष ने कहा कि यूनिफॉर्म का नियम किसी के धर्म मानने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता।
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याचिका निरस्त: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के अधिवक्ता आलोक तिवारी द्वारा राज्य की दलीलों का समर्थन किए जाने के बाद अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए पूर्णतः खारिज कर दिया।