टीएमसी बागी सांसदों की अयोग्यता पर तीन महीने की देरी
टीएमसी के बीस बागी सांसदों के मामला
कार्रवाई की तय समयसीमा पार हो चुकी है
ओम बिड़ला के समक्ष दर्ज है इसकी शिकायत
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा अब तक लिए गए तीन महीने के समय को ‘रेड फ्लैग’ (लाल झंडा) करार दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अयोग्यता याचिकाओं पर त्वरित निर्णय लेने की मांग की गई थी।
यह राजनीतिक विवाद जून महीने में उस समय सामने आया जब टीएमसी के 20 लोकसभा सांसद पार्टी से अलग हो गए और उन्होंने नेशनल सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया में शामिल होने का एलान किया। इन सांसदों ने निचले सदन (लोकसभा) में एक अलग समूह के रूप में मान्यता दिए जाने की भी मांग की थी।
इसके बाद अभिषेक बनर्जी ने 18 जून को अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष 20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल कीं। इसमें आरोप लगाया गया कि इन सांसदों ने स्वेच्छा से टीएमसी की सदस्यता छोड़ दी है, इसलिए वे संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के प्रावधानों के तहत अयोग्य ठहराए जाने के पात्र हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि लंबित अयोग्यता कार्यवाही के संभावित परिणामों को देखते हुए यह देरी काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सवाल किया कि जब यह मामला कुछ ही पलों का है और इसका देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी असर पड़ता है, तो इसे अब तक पूरा क्यों नहीं किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के ‘केशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष’ फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में तीन महीने की अवधि को बाहरी सीमा (आउटर लिमिट) माना जाना चाहिए।
अदालत में वकीलों की दलीलें अभिषेक बनर्जी की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ने 5 अगस्त को 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी कर 14 दिनों में जवाब मांगा था। इसके बाद सांसदों के अनुरोध पर समय-सीमा 22 सितंबर तक बढ़ा दी गई और अब आगे और समय की मांग की जा रही है। उन्होंने दलील दी कि इस तरह की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता।
दूसरी ओर, लोकसभा अध्यक्ष की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत द्वारा कोई भी न्यायिक समय-सीमा तय किए जाने का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अध्यक्ष एक संवैधानिक पदाधिकारी हैं और उन्हें उचित साक्ष्यों तथा तर्कों पर विचार करने के लिए सभी पक्षों को जवाब देने का पर्याप्त अवसर देना होगा।