बैलट से बैरिकेड तक पहुंचा भारतीय लोकतंत्र
आज भारत एक ऐसी परेशान करने वाली राजनीतिक स्थिति का सामना कर रहा है, जहाँ राजनीतिक विरोध धीरे-धीरे केवल व्यवधान और हंगामे की प्रतियोगिता बनता जा रहा है। कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी जैसी पार्टियां सड़क पर भीड़ जुटाने, संवैधानिक संस्थाओं के साथ टकराव मोल लेने और लगातार बेबुनियाद आरोपों को तूल देने की एक साझा रणनीति पर आगे बढ़ती हुई नजर आ रही हैं।
अब मूल सवाल यह नहीं रह गया है कि क्या विपक्ष सरकार को चुनौती दे सकता है, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या वह उन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान करने को तैयार भी है, जिनके जरिए सरकारें चुनी जाती हैं और विवादों का समाधान किया जाता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि वर्तमान सरकार असहमति को ही राष्ट्रद्रोह बताने पर अड़ी हुई है। इसी वजह से हर प्रदर्शन को, जो सरकार के खिलाफ हो, उसे कुचलने के लिए पूरी ताकत का इस्तेमाल किया जा रहा है।
भाजपा को भी यह समझना चाहिए कि मतदाताओं को कभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। एक ऐसी भाजपा के सामने, जो लगातार अपनी चुनावी मजबूती का परिचय दे रही है, विपक्ष के पास एक ठोस और राजनीतिक विकल्प पेश करने की बजाय सड़क पर तमाशा करने का मोह बढ़ता जा रहा है। नेपाल और बांग्लादेश के हालिया उदाहरण हमारे सामने एक चेतावनी भरे सबक के रूप में मौजूद हैं।
राहुल गांधी ने पहले भी युवा भारतीयों को संबोधित करते हुए विदेशों में हुए युवा-नेतृत्व वाले उथल-पुथल का हवाला दिया है। लेकिन भारत एक सुदृढ़ संवैधानिक लोकतंत्र है, जहां एक चुनी हुई संसद, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और शांतिपूर्ण राजनीतिक बदलाव के लिए स्थापित तंत्र मौजूद हैं। भारतीय राजनीति में सड़क-आधारित सत्ता परिवर्तन की शब्दावली का आयात करना, लोकतांत्रिक विरोध और व्यवस्था को अस्थिर करने के बीच की बारीक रेखा को धुंधला करने का जोखिम पैदा करता है। केवल व्यवधान को लोकतांत्रिक संवाद और अनुनय का विकल्प नहीं बनाया जा सकता है।
संवैधानिक पदों पर बैठे पदाधिकारी नियमित रूप से ऐसे ज्ञापन प्राप्त करते हैं, जिसका यह अर्थ नहीं होता कि वे उनमें लगाए गए दावों की प्रमाणिकता की पुष्टि कर रहे हैं। राष्ट्रपति के शिष्टाचार को विपक्ष के आरोपों की अप्रत्यक्ष स्वीकृति में नहीं बदला जा सकता। संवैधानिक संस्थाओं की व्याख्या को लेकर राहुल गांधी से जुड़ा यह पहला विवाद नहीं है। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही को लेकर उनकी पूर्व की टिप्पणियों के बाद उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी।
लेकिन जिस दिन सरकार बदली तो इसका असली सच क्या है, यह भी सामने आ जाएगा। यह सही बात है कि किसी आरोप को बार-बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता। मौजूदा विरोध प्रदर्शन एक अन्य चिंताजनक सवाल भी खड़े करते हैं—जब मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण पहले से ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और जांच के दायरे में है, तो ऐसे में सड़क पर आक्रामकता बढ़ाने की क्या जरूरत थी?
लेकिन इसका प्रतिप्रश्न है कि फिर मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट द्वारा फॉर्म छह को मान्यता दिये जाने संबंधी झूठ बोलने की क्या आवश्यकता थी। अदालत वह स्थान है जहाँ साक्ष्यों और सबूतों की परख होती है; सड़क कभी भी न्यायिक फैसले का विकल्प नहीं बन सकती। लेकिन हम यह भी देख रहे हैं कि बिना किसी मामले के उमर खालिद पिछले छह साल से जेल में बंद है।
अरविंद केजरीवाल द्वारा न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्म पर सीधा आरोप लगाने के बाद न्यायपालिका ही बैकफुट पर है। हाल के की फैसलों में यह नजर आता है कि न्यायपालिका के भीतर भी अनेक ऐसे लोग हैं, जो संघ की मानसिकता से संचालित होते हैं। वरना दंगाई भारद्वाज को अस्थायी जमानत मिलना संभव नहीं था। संवैधानिक संस्थाओं को इस बात की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए कि वे बिना किसी राजनीतिक पैंतरेबाजी के दबाव के अपना कार्य सुचारू रूप से कर सकें।
लेकिन शर्त यह भी है कि वे राजनीतिक निष्ठा से परे हटकर यह फैसला लें। चुनाव आयोग को ही लें तो बंगाल में लाखों मतदाताओँ को हटाकर चुनाव करा दिया गया। जब चुनाव हो गये तो शिकायत करने वाले अधिकांश लोगों का दावा सही निकला। फर्क सिर्फ इतना पड़ा कि चुनाव परिणाम में उनकी भागीदारी को काट दिया गया था। यह भी सही है कि विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार कोई ऐसा लाइसेंस नहीं है जिसके सहारे सार्वजनिक जीवन को ठप कर दिया जाए, वैध आदेशों की अवहेलना की जाए या संवैधानिक संस्थाओं को सड़क के दबाव के आगे झुकने के लिए मजबूर किया जाए। लेकिन किसी भी प्रदर्शन को कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा देना भी लोकतांत्रिक नहीं है। कोई भी दल लोकतंत्र पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकता। आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जहां लोकतंत्र के आगे राजतंत्र के डंडे की चुनौती है।