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झानेश कुमार की आईएएस पुत्री मेघा रूपम को कड़ी फटकार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा पीड़िता को हर्जाना दें

नोएडा के आंदोलन के दौरान एनएसए लगाया

अदालत ने कहा दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया

सभी अफसर जेब से यह हजार्ना अदा करेंगे

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा के एक श्रमिक आंदोलन में कथित भूमिका के लिए 24 वर्षीय छात्रा-कार्यकर्ता आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश प्रशासन और गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम को कड़ी फटकार लगाई है। बता दें कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री हैं और पहले भी कई विवादों में घिरी रही हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक आकृति को पाँच महीने की गैर-कानूनी हिरासत के बाद राहत देते हुए अदालत ने उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा राशि जिलाधिकारी और पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल की जाएगी। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने अपने 15 पन्नों के कड़े फैसले में कहा कि नौकरशाही का ऐसा निरंकुश रवैया उत्तर प्रदेश को जॉर्ज ऑरवेल द्वारा वर्णित ऑरवेलियन डिस्ट्रोपिया (जहाँ नागरिक स्वतंत्रता पर कड़ा सरकारी नियंत्रण और दमन होता है) की स्थिति में धकेल सकता है। अदालत ने फैसला सुनाया कि बिना किसी ठोस आधार और बिना दिमाग का प्रयोग किए जारी किया गया यह निरोध आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।

उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2026 में मजदूरों के वेतन वृद्धि से जुड़े एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आकृति चौधरी और पत्रकार-कार्यकर्ता सत्य वर्मा को गिरफ्तार किया था और 13 मई को उन पर एनएसए लगा दिया था।

अदालत ने अधिकारियों को याद दिलाते हुए कहा कि नौकरशाहों और पुलिस की निष्ठा केवल देश के संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति। अदालत ने कहा, लोकतंत्र में जनता मालिक है और अधिकारी जनता के सेवक हैं। जब अधिकारी अपनी शपथ के विपरीत काम करते हैं, तो लोग उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी अवशेष के रूप में देखने लगते हैं।

जिलाधिकारी मेधा रूपम के आचरण की आलोचना करते हुए पीठ ने कहा कि उनका कृत्य उपहास के योग्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिलाधिकारी ने दूसरों को विरोध दर्ज कराने से डराने और सबक सिखाने के इरादे से एनएसए की कठोर धाराओं का दुरुपयोग किया, जिसे सामान्य आपराधिक कानून के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने जिम्मेदार अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अपनी इस सख्त नाराजगी को दर्ज करने का भी निर्देश दिया है।