दीये तो खूब जले पर खर्च इसका किसने उठाया
गत 17 सितंबर 2026 को, जब देश ने आशीर्वाद का दीया कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन पर दीये जलाए, तो वहां कोई छल-कपट नहीं था। यह जनता और पार्टी के वफादारों को यह यकीन दिलाने का एक प्रयास था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पकड़ अभी भी मजबूत है। इसकी शुरुआत पार्टी के एक अभियान के रूप में हुई थी।
भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर 25 करोड़ दीये जलाने का आह्वान किया था। गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के निर्विवाद राष्ट्रीय नेता तक के उनके इस सफर को यादगार बनाने का यह अभियान देखते ही देखते एक बड़े जन-आंदोलन में बदल गया, जिसे देश भर के दर्जनों वरिष्ठ नौकरशाहों ने आगे बढ़ाया।
कई राज्यों में मुख्य सचिवों, जिला कलेक्टरों, जिला मजिस्ट्रेटों और उपायुक्तों ने इस अभियान की कमान संभाली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश भर में कुल 13 करोड़ दीये जलाए गए। इनमें से अकेले उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में 5.9 करोड़, छत्तीसगढ़ में 1.5 करोड़ और हरियाणा में लगभग 80 लाख दीये जलाए गए। असम (रवि कोटा), बिहार (प्रत्यय अमृत), हरियाणा (अनुराग रस्तोगी) और पश्चिम बंगाल (मनोज अग्रवाल) के चार मुख्य सचिवों ने इस कार्यक्रम की समीक्षा की और बाद में इसकी सफलता की जानकारी उच्च स्तर पर दी।
इसके अलावा गोरखपुर के डीएम दीपक मिश्रा, राजनांदगांव के कलेक्टर जितेंद्र यादव, ठाणे के कलेक्टर कृष्णा पंचल और सोनीपत की डीसी नेहा सिंह भी इस अभियान से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। दीयों की लागत, तेल, बाती, परिवहन, भीड़ जुटाने, प्रचार, आयोजन स्थलों और आधिकारिक श्रमशक्ति का कुल खर्च 50 से 75 करोड़ रुपये के बीच बैठ सकता है।
ये सभी अनौपचारिक अनुमान हैं, और किसी को यह स्पष्ट नहीं है कि इस भारी-भरकम खर्च को केंद्र सरकार ने उठाया या राज्य सरकारों ने। जानकारी का यह अभाव शायद इन दीयों की सामूहिक रोशनी से भी ज्यादा चमक रहा है। चुनाव के करीब आते उत्तर प्रदेश की नौकरशाही जाति, कैडर और सत्ता के करीब रहने के समीकरणों से तय होती रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में इसमें एक और आयाम जुड़ गया है, और वह है कुछ चुनिंदा और भरोसेमंद वरिष्ठ सिविल सेवकों के हाथों में प्रमुख जिम्मेदारियों का केंद्रीयकरण। मुख्य सचिव शशि प्रकाश गोयल सबसे वरिष्ठ सेवारत आईएएस अधिकारी और प्रमुख समन्वय अधिकारी हैं। उनके साथ संजय प्रसाद हैं, जो सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अपर मुख्य सचिव हैं और जिन्हें राज्य अभियोजन विभाग द्वारा गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव के रूप में भी पहचाना जाता है।
दीपक कुमार बुनियादी ढांचा और औद्योगिक विकास आयुक्त हैं। आलोक कुमार अपर मुख्य सचिव के रूप में उनका साथ देते हैं, और दोनों मिलकर मुख्यमंत्री की आर्थिक प्राथमिकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर, राजीव कृष्ण पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हैं, जिन्हें ध्रुवकांत ठाकुर, जय नारायण सिंह, आलोक सिंह और बिनोद कुमार सिंह जैसे वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग प्राप्त है। ये अधिकारी होमगार्ड, आर्थिक अपराध शाखा, पीएसी, सीआईडी, साइबर अपराध और आपातकालीन प्रतिक्रिया जैसी अहम कमान संभाल रहे हैं।
19 सितंबर 2026 को उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव किया गया, जब लखनऊ, कानपुर, आगरा, प्रयागराज, गौतम बुद्ध नगर और वाराणसी जैसे शहरों में कमिश्नरेट, जिलों और विशेष इकाइयों के बीच 35 अधिकारियों का तबादला किया गया। इस फेरबदल के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि पुलिस बल के ऑपरेशनल कमांड स्तर पर, विशेषकर एसएचओ और सीओ की श्रृंखला में, ठाकुर समुदाय के अधिकारियों का प्रभाव जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है।
कुछ पैनी नजर रखने वाले विश्लेषक इन बदलावों और इस केंद्रीयकरण को फरवरी-मार्च 2027 में संभावित आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। दिल्ली ने एक अजीबोगरीब प्रशासनिक विरोधाभास का सामना किया है। यहां एक चुनी हुई सरकार है, जिसकी कमान मुख्यमंत्री (भाजपा की रेखा गुप्ता) के हाथ में है।
इसके बावजूद, यहां की नौकरशाही सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह है, जिसके पास प्रशासनिक कैडर का नियंत्रण है। यह मामला आम आदमी पार्टी की सरकार के समय से ही अधिक प्रभावी हो गया है। लेकिन असली मुद्दा दीया जलाने का है। जहां जहां इस आयोजन को किया गया, वहां का सारा खर्च किसने उठाया, यह बड़ी बात है।
जंतर मंतर प्रदर्शन के बाद बदले परिवेश में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या जनता का पैसा किसी निजी जन्मदिन समारोह में भी खर्च करना समझदारी है। जनता के मन में जो सवाल पहले दबे हुए थे अब वे मुखर तौर पर सामने आ रहे हैं और इससे चुनावी राज्यों में भाजपा की परेशानी बढ़ती ही जा रही है।