Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
दिल्ली पेलेट गन मामले में पहली FIR दर्ज: राहुल गांधी के 8 घंटे धरने के बाद BNS 118 व 125 में केस एक शब्द का गलत प्रयोग और मोदी की परेशानी पेलेट गन मामले में FIR की मांग पर संसद मार्ग थाने में धरने पर बैठे राहुल गांधी, BJP का पलटवार मसूरी-कैंपटी रोड पर भूस्खलन का कहर: सांझा दरबार के पास मकान और दुकान पूरी तरह ध्वस्त दिल्ली में प्रदूषण पर बड़ा एक्शन: 2,011 फैक्ट्रियों की जांच, 33 पर क्लोजर ऑर्डर और 44 पर लगा भारी जु... 'प्रति व्यक्ति आय में भारत बांग्लादेश से भी पिछड़ा': अरविंद केजरीवाल का केंद्र सरकार पर बड़ा हमला 26/11 मुंबई हमला: हाफिज सईद और लखवी समेत 6 भगोड़ों पर चलेगा इन-एब्सेंटिया ट्रायल, MHA ने इंटरपोल से ... दिमागी नक्सल का वायरस कोलकाता भी आ पहुंचा सहारनपुर में व्यक्ति की चोटी काटकर की मारपीट: फसल पर चलाया ट्रैक्टर, SSP ऑफिस पहुंचे ब्राह्मण समाज क... नासिक में गिट्टी उतारते समय धंसी सड़क: 10 से 12 फीट गहरे गड्ढे में गिरा डंपर, बाल-बाल बचे लोग

एक शब्द का गलत प्रयोग और मोदी की परेशानी

सुनने में यह थोड़ा पहेली जैसा लग सकता है, लेकिन इसमें हर्ज ही क्या है? क्रिकेट की भाषा में सहज ही कहा जा सकता है कि शून्य रन पर चार-चार विकेट गिर चुके हैं। ऐसी आक्रामक गेंदबाजी के सामने यह पारी कितनी देर टिकेगी, यह कोई नहीं जानता। सबसे पहला विकेट केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का गिरा। छात्रों ने दूसरा और तीसरा विकेट एक ही ओवर में गिरा दिया।

हैदराबाद की प्रसिद्ध नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (नॉलसार) के छात्रों ने कुलपति के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि वे उस मुख्य न्यायाधीश के हाथों से अपनी स्नातक की डिग्री लेने से इनकार करते हैं, जिन्होंने पुलिस अत्याचार के वीडियो को देखने से इनकार कर दिया था और अदालत का समय बर्बाद न करने का निर्देश दिया था। मुख्य न्यायाधीश एक समझदार व्यक्ति हैं।

उन्होंने बिना किसी देरी के यह स्पष्ट कर दिया कि जब उन्होंने निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया है, तो दीक्षांत समारोह में जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। तीसरा विकेट रातोरात गिर गया। विधि विश्वविद्यालय के छात्रों के गुस्से के सामने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और भाजपा के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने खुद को स्वघोषित संरक्षक बताते हुए संभावित लॉ स्नातकों को सबक सिखाने के लिए कुलपति को एक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि उनकी अनुमति के बिना 2026 के स्नातक किसी भी राज्य में वकील के रूप में अपना पंजीकरण नहीं करा पाएंगे। इतने दिनों तक चुप बैठे सीजेपी के सदस्य मनन की इस धमकी पर हरकत में आ गए। अभिजीत दीप ने एक्स हैंडल पर पोस्ट किया, अगर वकालत पेशे के सारे कॉकरोच एकजुट हो जाएं तो कैसा रहेगा? सीजेपी के प्रवक्ता सौरभ दास ने सीधे तौर पर मनन की जवाबदेही पर सवाल उठाया।

जंतर-मंतर का घाव अभी भी ताजा था। चार घंटे के भीतर मनन कुमार मिश्रा ने अपना बयान वापस ले लिया और शर्मिंदा हुए। उन्होंने 18 घंटे के भीतर छात्रों से माफी मांगते हुए एक पत्र भी लिखा। मोदी के दौर में इतनी जल्दी मन बदलना किसने देखा है?  चौथा विकेट विपक्षी शासित झारखंड में गिरा। वहाँ भी छात्र समाज की जीत हुई। तीन सप्ताह के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनकी सरकार के सहयोगी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी आंदोलनकारियों के समर्थन में खड़े होकर दबाव बनाया था। सीबीआई जांच की मांग अभी तक नहीं मानी गई है।

छात्र आगे क्या करेंगे, यह आने वाले समय में स्पष्ट हो जाएगा। जेनरेशन जेड से प्रेरित होकर जेनरेशन अल्फा, यानी 2010 से 2024 के बीच पैदा हुए छोटे बच्चों का समूह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सक्रिय हो गया है। 15 अगस्त से कॉकरोच का स्कूल ठीक करो आंदोलन शुरू हो चुका है। ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए वे लगातार आगे आ रहे हैं। कॉकरोच के इस आह्वान को अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिली है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित विभिन्न स्थानों पर 10-12 साल के छोटे-छोटे बच्चों ने पुलिस की परवाह किए बिना सड़क जाम कर दी।

पुलिस और प्रशासन के लिए उन्हें संभालना मुश्किल हो गया है। गोदी मीडिया नहीं, बल्कि सोशल मीडिया राज्यों में जनरेशन अल्फा के इस विरोध प्रदर्शन से भर गया है। इसके साथ ही एक और तस्वीर उभर कर सामने आ रही है। सीजेपी के नेताओं को रोकने के लिए राजस्थान सरकार ने आदेश जारी किया है कि बिना अनुमति के कोई भी बाहरी व्यक्ति किसी भी सरकारी स्कूल में प्रवेश नहीं कर पाएगा।

इससे क्या संकेत मिलता है? यह स्पष्ट है कि सरकार का डर तेजी से दूर हो रहा है। जंतर-मंतर ने जिस चेतना को जगाया है, उसका गहरा प्रभाव जनरेशन जेड और जनरेशन अल्फा पर पड़ा है। जो लोग अब तक डरे हुए थे, वे अब मुखर हो गए हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं। जब गृह मंत्री अमित शाह नक्सलवादियों और माओवादियों की रीढ़ तोड़ने के दावों का जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं, तो प्रधानमंत्री ने अचानक दिमागी नक्सल कहकर किसे चिन्हित करना चाहा?

लेकिन ये युवा डरे नहीं हैं। समस्याओं के समाधान में पूर्ण अक्षमता है। सुनिए, दिमागई नक्सल या आप जो चाहें कह लें, अब ये सब तरकीबें काम नहीं आएंगी। घंटी बज चुकी है। सभी लोग जाग चुके हैं। यह जागरण ही तो है। वरना इतने धड़ाधड़ विकेट कैसे गिरते? सिर्फ सीजेआई के मुंह से निकले एक शब्द ने अचानक देश की राजनीति ही बदल दी है। अब इसे क्या कहें यह भी नये सिरे से विचार का नया विषय बन चुका है।