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कई स्कैम के बाद फिर से बैंक ऑफ बड़ौदा विवादों में आया

ग्राहकों का एक टीवी डेटा डार्क वेब में चला गया

डार्क वेब में इसे बेचा जा रहा है

बैंक के ग्राहकों की निजता खतरे में

साइबर अपराधियों को मिलता है लाभ

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः भारत में डिजिटल बैंकिंग के बढ़ते उपयोग के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख बैंकों में से एक, बैंक ऑफ बड़ौदा में संभावित बड़े डेटा लीक का मामला सामने आया है। साइबर सुरक्षा से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 1 टेराबाइट अत्यंत संवेदनशील ग्राहक डेटा डार्कनेट पर लीक होने और वहां बोली लगाकर बेचे जाने का दावा किया जा रहा है। इस लीक में लाखों ग्राहकों के व्यक्तिगत पहचान पत्र, बैंक खाता संख्या, फोन नंबर, पते और वित्तीय लेनदेन से जुड़े विवरण शामिल होने की आशंका जताई गई है, जिसने बैंकिंग क्षेत्र और खाताधारकों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है।

कोविड-19 महामारी और उसके बाद लगे लॉकडाउन के समय से ही भारत में इंटरनेट का उपयोग अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। आज के समय में देश में करीब 100 करोड़ (1 बिलियन) लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। शिक्षा, मनोरंजन और कार्यालयी कार्यों के अलावा कैशलैश और यूपीआई लेनदेन के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। हालांकि, इस बढ़ती निर्भरता का फायदा साइबर अपराधी और हैकर्स भी उठा रहे हैं। ऑनलाइन जालसाज मासूम नागरिकों को ठगने और उनके खातों से पैसे चुराने के लिए नए-नए और चालाकी भरे तरीके अपना रहे हैं।

मामले की जांच में यह बात सामने आई है कि हैकर्स बैंकों के डेटा सर्वर में सेंध लगाकर कई गीगाबाइट या टेराबाइट आकार का भारी-भरकम डेटा चुरा लेते हैं। इसके बाद इस चोरी किए गए डेटा को डार्कनेट जैसे अवैध और अप्रशिक्षित साइबर बाजारों में उच्चतम बोली लगाने वाले साइबर अपराधियों को बेच दिया जाता है। इस तरह के लीक हुए डेटा का उपयोग फ़िशिंग हमलों, फर्जी कॉल, सिम स्वैप धोखाधड़ी और अन्य वित्तीय अपराधों को अंजाम देने के लिए किया जाता है।

वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वे मालवेयर और रैनसमवेयर हमलों से अपने डेटा सर्वरों को सुरक्षित रखने के लिए अत्यधिक मजबूत साइबर सुरक्षा तंत्र स्थापित करें। हालांकि, विशेषज्ञ चिंता जताते हैं कि देश के कई वित्तीय संस्थान, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक समय रहते अपने बुनियादी ढांचे और सुरक्षा प्रोटोकॉल को अपडेट करने में विफल रहते हैं, जिससे ग्राहकों की गोपनीय जानकारी जोखिम में पड़ जाती है। इस घटना के बाद बैंक प्रशासन और साइबर विशेषज्ञों द्वारा सर्वरों का ऑडिट कराया जा रहा है।