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पेगासस स्पाईवेयर, पोलैंड के घटनाक्रम से भारत के लिए सबक

इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप द्वारा विकसित पेगासस स्पाईवेयर समकालीन विश्व राजनीति में निगरानी, गोपनीयता और लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है। जिस तकनीक को आतंकवाद और गंभीर अपराधों से लड़ने के लिए बनाया गया था, उसका कथित इस्तेमाल दुनिया के कई लोकतंत्रों में विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं की जासूसी के लिए किया गया।

हाल ही में पोलैंड के एक पूर्व मंत्री का देश छोड़कर भागना और फिर हंगरी से अमेरिका शरण लेना इस बात का प्रमाण है कि जब राजनीतिक सत्ता बदलती है, तो पिछली सरकार के डिजिटल पदचिन्ह कानून के कठघरे में खड़े हो जाते हैं। भारत के संदर्भ में भी यह सवाल अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है कि यदि भविष्य में राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, तो पेगासस का मुद्दा देश की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे को किस तरह प्रभावित करेगा।

पोलैंड में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार ने पेगासस के दुरुपयोग की जांच के लिए एक विशेष संसदीय समिति का गठन किया। जांच में पाया गया कि पूर्ववर्ती सरकार ने राजनेताओं और वकीलों की जासूसी के लिए इस स्पाईवेयर का अवैध उपयोग किया था। इसके परिणामस्वरूप, वे अधिकारी और मंत्री जो कभी सर्वशक्तिमान माने जाते थे, आज कानूनी कार्रवाई के डर से देश छोड़ने पर मजबूर हैं।

यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि तकनीकी गोपनीयता स्थायी नहीं है और शासन बदलने पर प्रशासनिक फाइलों का फिर से खुलना तय है। भारत में पेगासस का मुद्दा 2021 में पेगासस प्रोजेक्ट के खुलासे के बाद गरमाया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए एक तकनीकी समिति भी गठित की थी।

हाल ही में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब भारतीय सेना ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट कर दिया कि उसका एनएसओ ग्रुप के साथ कोई प्रत्यक्ष सौदा नहीं हुआ है। सेना के इस स्पष्टीकरण ने इस रहस्य को और गहरा दिया है कि यदि यह स्पाईवेयर भारत में इस्तेमाल हुआ (जैसा कि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का दावा है), तो इसकी खरीद किस एजेंसी द्वारा की गई थी? क्या यह कोई खुफिया एजेंसी थी या गृह मंत्रालय के अधीन कोई विभाग?

संसदीय लोकतंत्र में सेना का तटस्थ रहना एक स्वस्थ परंपरा है, लेकिन नागरिक एजेंसियों द्वारा ऐसी तकनीक का उपयोग सीधे तौर पर चेक एंड बैलेंस (नियंत्रण और संतुलन) के सिद्धांत को चुनौती देता है। यदि भारत में भविष्य में सत्ता परिवर्तन होता है, तो पेगासस का मुद्दा पोलैंड की तरह ही एक पेंडोरा बॉक्स साबित हो सकता है। इसके संभावित असर कई क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं।

नई सत्ता के आने पर पेगासस की खरीद और उसके उपयोग के आदेश देने वाली कड़ियों की पहचान के लिए न्यायिक आयोग या संसदीय जांच समिति का गठन अपरिहार्य हो जाएगा। चूंकि फाइलों और डिजिटल लॉग्स को पूरी तरह नष्ट करना असंभव होता है, इसलिए उन नौकरशाहों और राजनीतिक आकाओं की जवाबदेही तय होगी जिन्होंने संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर व्यक्तिगत गोपनीयता पर हमला किया। पोलैंड की तरह भारत में भी उन अधिकारियों पर गाज गिर सकती है जिन्होंने अवैध आदेशों का पालन किया।

भारतीय प्रशासनिक सेवा और पुलिस सेवा के अधिकारियों के लिए यह एक कड़ा संदेश होगा कि सत्ता की मर्जी संविधान से ऊपर नहीं है। यदि किसी एजेंसी ने बिना ठोस कानूनी आधार के जासूसी की है, तो उसके प्रमुखों को भविष्य में अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है। पेगासस का मुद्दा केवल आंतरिक नहीं है। इसमें इजरायल की कंपनी और अन्य देशों की संलिप्तता भी शामिल है।

सत्ता बदलने पर भारत सरकार इजरायल से उन सौदों का विवरण मांग सकती है जिन्हें वर्तमान में राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर गोपनीय रखा गया है। पेगासस केवल एक सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और निगरानी की भूख का एक उपकरण बन गया है। पोलैंड के पूर्व मंत्री का पलायन यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।

भारत में सेना द्वारा पल्ला झाड़ लेने के बाद अब गेंद उन नागरिक सुरक्षा एजेंसियों के पाले में है जिनके माध्यम से इसकी खरीद के कयास लगाए जा रहे हैं। कल की तारीख में यदि राजनीतिक बदलाव आता है, तो पेगासस का मुद्दा प्रतिशोध की राजनीति के बजाय संवैधानिक शुद्धि का जरिया बनना चाहिए। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच की धुंधली रेखा को स्पष्ट किया जाए। जो लोग आज तकनीक के पीछे छिपकर गोपनीयता का हनन कर रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता का मत तकनीकी एन्क्रिप्शन से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। अंततः, सत्य की शुचिता ही किसी भी लोकतंत्र की अंतिम रक्षा पंक्ति है।