जंतर मंतर का आंदोलन फिर से शीर्ष अदालत के विचारार्थ
मामूली अपराधों को नजरअंदाज किया जाए
अदालत अपनी देखरेख में कमेटी बनायेगी
मामले की अगली सुनवाई अब 19 अगस्त को
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली और अन्य राज्य पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के दौरान छात्रों पर दर्ज मामलों को बंद करने या वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं। यह टिप्पणी तब आई जब केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए इसे लेकर गंभीरता जताई।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी मोहना की पीठ ने कहा कि वह संसद मार्च के दौरान हुई घटनाओं की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन करेगी। यह मामला 20 जुलाई की उन घटनाओं से संबंधित है, जब सीजेपी के मार्च के दौरान हिंसा भड़क गई थी और पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए और लाठीचार्ज किया गया था।
सीजेआई ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया, अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले पुलिस अधिकारी को अनुचित सुरक्षा नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि छात्र प्रदर्शन की आड़ में कोई कठोर अपराधी लाभ न उठा सके। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर के संबंध में कुछ गलतफहमी थी, लेकिन सरकार छात्रों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर गंभीर है। अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने इस बात पर जोर दिया कि मुद्दा शिक्षा प्रणाली में सुधार का है और ये युवा भविष्य की ओर देख रहे हैं। उन्होंने बिहार, बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की।
अदालत ने आपराधिक पृष्ठभूमि के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसमें केवल गंभीर और जघन्य अपराध ही शामिल होने चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आग्रह किया कि इसमें छोटे-मोटे अपराधों और राजनीतिक विरोध से संबंधित धाराओं को बाहर रखा जाए। जब केंद्र ने बताया कि 2,738 प्रदर्शनकारियों की आपराधिक पृष्ठभूमि पाई गई है, तो विपक्ष ने फेशियल रिकग्निशन के इस्तेमाल पर गोपनीयता के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया। मेहता ने स्पष्ट किया कि पहचान के लिए सोशल मीडिया और अन्य साधनों का भी उपयोग किया गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।