भारतीय विपक्ष का संकट: चुनावी हार से कहीं गहरा है मनोवैज्ञानिक अवरोध
भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में विपक्षी दलों के सामने खड़ी चुनौतियाँ अब केवल सीटों के गणित या चुनावी हार-जीत तक सीमित नहीं रह गई हैं। हकीकत यह है कि भारतीय विपक्ष आज अपने सबसे गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है, जो चुनावी कम और मनोवैज्ञानिक अधिक है। पिछले लगभग एक दशक से, भाजपा विरोधी राजनीति मुख्य रूप से एक ही धारणा के इर्द-गिर्द घूमती रही है: यह विश्वास कि जनता का असंतोष, आर्थिक संकट, संस्थागत विवाद या स्वयं सत्ताधारी दल के भीतर के अंतर्विरोध अंततः स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्चस्व को कमजोर कर देंगे।
आज यह धारणा राजनीतिक वास्तविकता से पूरी तरह कटी हुई प्रतीत होती है। भारतीय जनता पार्टी अब केवल एक नेता पर निर्भर रहने वाले दल से कहीं आगे निकल चुकी है। यह एक ऐसी डिफ़ॉल्ट राष्ट्रीय राजनीतिक मशीन बन गई है, जैसा भारत ने स्वतंत्रता के बाद के अपने चरम दौर में कांग्रेस के समय भी नहीं देखा था। भाजपा की शक्ति केवल उसके संगठनात्मक विस्तार या विशाल वित्तीय संसाधनों में निहित नहीं है, बल्कि इसकी असली ताकत भारतीय राजनीति के भावनात्मक केंद्र पर कब्जा करने में है।
भाजपा ने एक साथ राष्ट्रवाद, विकास की आकांक्षा, कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच और सांस्कृतिक आत्मविश्वास जैसे स्तंभों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया है। विपक्षी दल अभी तक इस बड़े बदलाव को समझने में पूरी तरह विफल रहे हैं। अधिकांश गैर-भाजपा दल अभी भी एक सशक्त राष्ट्रीय विकल्प के बजाय रक्षात्मक क्षेत्रीय संरचनाओं के रूप में काम कर रहे हैं।
उनकी राजनीति अक्सर राज्य की सीमाओं के भीतर भाजपा के विस्तार को रोकने पर टिकी होती है, न कि एक प्रेरक राष्ट्रीय दृष्टिकोण के निर्माण पर। यही कारण है कि आज भारत में एक विरोधाभास दिखाई देता है: क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक बनी हुई हैं, लेकिन सामूहिक रूप से वे राष्ट्रीय शक्ति संतुलन को बदलने में असमर्थ नजर आती हैं।
इस दुविधा का सबसे तीखा रूप कांग्रेस के सामने है। पिछले तीन दशकों में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों के हाथों अपना सामाजिक आधार खोने के बाद, कांग्रेस अब अपने अस्तित्व के लिए उन्हीं दलों पर निर्भर है। इसका परिणाम एक रणनीतिक पक्षाघात के रूप में सामने आया है। कोई भी पार्टी जो अपना पुनरुत्थान चाहती है, वह उन ताकतों की जूनियर पार्टनर बनकर लंबे समय तक नहीं चल सकती जिन्होंने उसकी जगह ली है।
विपक्ष का वैचारिक भटकाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भाजपा ने खुद को राष्ट्रवाद और राजनीतिक आत्मविश्वास के संरक्षक के रूप में सफलतापूर्वक स्थापित किया है। इसके विपरीत, कई विपक्षी नेता उसी धरातल पर संवाद करने में असहज महसूस करते हैं। इसने सत्ताधारी दल को यह मौका दे दिया कि वह अपने आलोचकों को बहुसंख्यक भावनाओं से कटा हुआ दिखा सके, विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा, पहचान और धर्म से जुड़े मुद्दों पर। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पूरा भारत एक समान रूप से दक्षिणपंथी हो रहा है।
2024 के लोकसभा चुनावों ने स्वयं यह दिखाया कि मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने भाजपा को वोट नहीं दिया। लेकिन, मतदाता अब खंडित गठबंधन के गणित के बजाय स्पष्टता, दृढ़ विश्वास और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को अधिक महत्व दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी इसी सीख को पुख्ता करते हैं। कई लोकतंत्रों में जहां राष्ट्रवादी सरकारें हावी रही हैं, वहां विपक्ष की जीत केवल विशिष्ट वर्ग के बीच सहमति बनाने से नहीं, बल्कि आम जनता की रोजमर्रा की चिंताओं—जैसे महंगाई, वेतन, सार्वजनिक सेवाओं और भ्रष्टाचार—से जुड़कर मिली है।
सफल विपक्ष ने राष्ट्रीय पहचान को छोड़ने के बजाय उस पर अपना दावा पेश किया। इसके विपरीत, भारतीय विपक्षी दल अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया के आक्रोश और संस्थागत शिकायतों के एक सीमित दायरे में फंसे नजर आते हैं। इनमें से कोई भी ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक पुनर्निर्माण का विकल्प नहीं हो सकता। भाजपा का उत्थान कोई आकस्मिक घटना नहीं थी; इसे दशकों तक कैडर विस्तार, वैचारिक निरंतरता और नैरेटिव अनुशासन के माध्यम से धैर्यपूर्वक बनाया गया था।
ऐसी विशाल संरचना को हराने के लिए केवल चुनावी गठबंधन या नैतिक आलोचना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए एक प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक कल्पना की आवश्यकता है। वर्तमान में, विपक्ष के पास न तो नेताओं की कमी है और न ही मुद्दों की। कमी है तो बस एक ऐसी राष्ट्रीय कहानी की, जिस पर जनता विश्वास कर सके। लिहाजा इस परिस्थिति में न तो भाजपा को और ना ही विपक्ष को संतुष्ट अथवा असंतुष्ट होने का कोई अवसर नहीं है। भाजपा की बढ़त की एकमात्र वजह चुनाव आयोग ही नहीं है। विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी बातें जनता के दिलों में पैठ नहीं बना पा रही है।