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अब सीधे ना बोलना सीख गये हैं हेमंत सोरेन

सोशल मीडिया पर तूफान उठाकर राज्यसभा की दावेदारी

  • एक टिकट तो झामुमो का पक्का रहेगा

  • दूसरी सीट के लिए मची है मारा मारी

  • प्रभारी का आना बेकार साबित हुआ है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में राज्यसभा की रिक्त होने वाली दो सीटों में से कम से कम एक सीट अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस पार्टी के भीतर इन दिनों भारी राजनीतिक घमासान और जद्दोजहद का दौर जारी है। इसी सिलसिले में हाल ही में कांग्रेस के केंद्रीय प्रभारी अपने दो सहयोगियों के साथ रांची पहुंचे थे, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह है कि इस दौरे से पार्टी को अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला।

राज्य की सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होने के बावजूद, कांग्रेस की स्थिति फिलहाल कमजोर नजर आ रही है, क्योंकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के रुख से स्पष्ट है कि वे अब राज्य के स्थानीय कांग्रेस नेताओं को राज्यसभा भेजने के मामले में अधिक तरजीह देने के मूड में नहीं हैं।

मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए, यदि कांग्रेस को एक सीट मिलती भी है, तो इसकी संभावना बेहद कम है। जानकारों का मानना है कि यदि कोई चमत्कारिक निर्णय होता है, तो वह केवल कांग्रेस हाईकमान और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बीच सीधे हस्तक्षेप या आपसी समन्वय के बाद ही संभव होगा।

दिल्ली की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के जो कद्दावर नेता खुद को प्रबल दावेदार मान रहे थे, उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। उदाहरण के तौर पर, धीरज साहू का नाम दौड़ से बाहर माना जा रहा है, क्योंकि वे पहले भी कई बार राज्यसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

इस अनिश्चितता के बीच, एक नया नाम कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा का मजबूती से उभर कर सामने आ रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राहुल गांधी स्वयं इस मामले में हेमंत सोरेन से सीधी वार्ता करते हैं, तो पवन खेड़ा का नाम राज्यसभा के लिए फाइनल हो सकता है।

दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर टिकट की आकांक्षा रखने वाले नेता सोशल मीडिया के जरिए ‘माहौल बनाने’ की कवायद में जुटे हैं। समर्थकों के माध्यम से अपनी दावेदारी को पुख्ता दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में राजनीति के गलियारों में ऐसी खबरें भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं कि कुछ नेता अपने पक्ष में जनसमर्थन और लॉबिंग के लिए टी-शर्ट और शराब तक का वितरण कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन टी-शर्ट्स के रंग और डिजाइन को इतनी विविधता के साथ चुना गया है कि यह पहचानना मुश्किल हो रहा है कि किन-किन लोगों को यह ‘विशेष कृपा’ प्राप्त हुई है। कुल मिलाकर, झारखंड में राज्यसभा की यह सीट कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न तो है ही, साथ ही यह पार्टी की आंतरिक गुटबाजी और केंद्रीय नेतृत्व की बढ़ती दखल को भी उजागर कर रही है।