अब एसआईआर पर सरकार चर्चा नहीं करेगी
पश्चिम बंगाल में चुनाव के पहले एसआईआर को विदेशियों और घुसपैठियों के खिलाफ एक हथियार बताया गया था। अब चुनाव खत्म होने के बाद मतदाता सूची से निकाले गये मतदाता अब भी न्याय की उम्मीद में खड़े हैं। दूसरी तरफ यह सवाल अनुत्तरित है कि एसआईआर प्रक्रिया में कितने विदेशी घुसपैठियों का पता चल पाया है।
जाहिर है कि सत्ता हासिल होने के बाद अब भाजपा भी इस मुद्दे पर बोलने से परहेज करेगी। पेरिस के साइंसेज पो में शोधकर्ता गिल्स वर्नियर लिखते हैं, हम डाले गए वोटों की गिनती तो कर सकते हैं, लेकिन उन वोटों को वापस नहीं पा सकते जिन्हें कभी डालने ही नहीं दिया गया। वर्नियर, जिन्होंने अशोक यूनिवर्सिटी में रहते हुए पिछले चुनावों के आंकड़ों का विस्तृत डेटाबेस तैयार करने में मदद की थी, लंबे समय से भारतीय चुनावी राजनीति के विश्लेषक रहे हैं।
उन्होंने स्वीकार किया कि वे पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करने में असमर्थ हैं। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव आयोग के हस्तक्षेप ने परिणामों को इतना धुंधला कर दिया है कि किसी भी स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचना असंभव हो गया है। हैरानी की बात यह है कि मुख्यधारा के समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने एसआईआर की भूमिका का उल्लेख करने से पूरी तरह परहेज किया।
इस प्रक्रिया के कारण पश्चिम बंगाल के 34 लाख मतदाताओं को संदिग्ध आधार पर मताधिकार से वंचित कर दिया गया। ये सभी भारतीय नागरिक थे और स्वयं चुनाव आयोग ने भी इन्हें विदेशी या बांग्लादेशी नहीं बताया था। इनमें से बमुश्किल 1,600 लोग ही अपीलीय न्यायाधिकरणों तक पहुँच सके, जिनमें से 99 प्रतिशत लोगों को अदालत ने वापस मतदाता सूची में बहाल कर दिया।
वे किसे वोट देते, यह तो नहीं जाना जा सकता, लेकिन अब यह सार्वजनिक तथ्य है कि इनमें से बड़ी संख्या में महिलाएं और मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल थे। इसकी वजह से चुनाव परिणामों में जो बदलाव हुआ वह भी अब सभी के सामने है। मीडिया की सुर्खियों में चुनावी प्रक्रिया की विसंगतियों के बजाय तमाशे और व्यक्तित्व को केंद्र में रखा गया।
अखबारों के पहले पन्नों पर बंगाली शैली की धोती पहने नरेंद्र मोदी की तस्वीरों का दबदबा रहा। अखबारों ने बंगाल और असम में भाजपा के प्रदर्शन का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री को दिया। शब्दों की बाजीगरी जमकर की गई। एक अखबार ने अपनी सुर्खी में बंगाल में ऐतिहासिक बदलाव लिखकर चतुराई दिखाने की कोशिश की, जो तृणमूल से नमो (मोदी) की ओर झुकाव को दर्शाता था।
किसी और ने इसे झालमुड़ी का शीर्षक दिया, जो प्रधानमंत्री द्वारा झाड़ग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान सड़क किनारे बिकने वाली झालमुड़ी खरीदने की फोटो-अप घटना का एक कृत्रिम संदर्भ था। एक प्रमुख समाचार पत्र समूह के हिंदी संस्करण ने फुटबॉल के मैदान का एक बड़ा चित्रण प्रकाशित किया। इसमें गोलकीपर के रूप में ममता बनर्जी को जमीन पर लेटा हुआ दिखाया गया और मोदी को पेनल्टी किक मारते हुए दिखाया गया, जहाँ गेंद नेट के भीतर है।
इसी चित्र में अमित शाह को फुटबॉल गियर में हाथ उठाकर जश्न मनाते दिखाया गया—यह एकमात्र ऐसा अखबार था जिसने गृह मंत्री को फ्रंट पेज पर प्रमुखता दी। ऐसी सुर्खी ने दोनों नेताओं को भारतीय राजनीति के बाबूमोशाय कहकर संबोधित किया, हालांकि शीर्षक लेखक और चित्रकार का वास्तविक आशय अस्पष्ट ही रहा।
शायद द इंडियन एक्सप्रेस एकमात्र ऐसा अखबार था जिसने पश्चिम बंगाल में मतदान पर एसआईआर के प्रभाव का विश्लेषण करने का प्रयास किया, लेकिन वह भी आंकड़ों के जाल में उलझकर रह गया। रिपोर्ट में आगे बताया गया: जिन 187 सीटों पर 5,000 से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे, उनमें से 119 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की या वह बढ़त बनाए हुए थी।
इन 187 निर्वाचन क्षेत्रों में से 47 ऐसी सीटें थीं जहाँ हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत-हार के अंतर से कहीं अधिक थी। कुल मिलाकर, विश्लेषण ही यह स्पष्ट करता है कि इन 187 सीटों में से कम से कम 47 सीटों पर यदि मतदाता सूची से नाम न हटाए गए होते, तो परिणाम पूरी तरह से बदल सकते थे।
इसके बावजूद, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा चुनाव की शुचिता और मतदाता निष्कासन जैसे गंभीर संवैधानिक मुद्दों पर मौन रहा और केवल जीत के जश्न और व्यक्तिगत महिमामंडन तक सीमित रह गया। यह चुनाव भारतीय मीडिया के उस चरित्र को उजागर करता है जहाँ प्रक्रियात्मक खामियों पर सवाल उठाने के बजाय केवल शक्ति की भाषा को ही प्राथमिकता दी गई। अब चुनाव संपन्न होने के बाद इस सबसे प्रमुख मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं होना ही नैरेटिव को बदलने का नया खेल है।