विकास और जनसांख्यिकीय चुनौतियों की अनदेखी
बंगाल के चुनावी आसमान में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन से उपजे विवाद की धूल छाई हुई है। कभी-कभी इसे सांस्कृतिक पहचान की राजनीति और हवा देने लगती है, जब उम्मीदवार अपनी बंगाली पहचान सिद्ध करने के लिए हाथ में मछली लेकर प्रचार करते नजर आते हैं।
लेकिन इस शोर-शराबे में राज्य के विकास पथ पर कोई सार्थक चर्चा कहीं खो गई है—चाहे वह तत्काल आर्थिक चिंताएं हों या जनसांख्यिकीय परिवर्तन और शहरीकरण से उत्पन्न दीर्घकालिक संरचनात्मक चुनौतियां। बंगाल के युवाओं के लिए रोजगार सृजन सबसे ज्वलंत मुद्दा है। सतह पर आंकड़े आश्वस्त करने वाले लगते हैं: नीति आयोग की मैक्रो एंड फिस्कल पॉलिसी लैंडस्केप रिपोर्ट 2025 के अनुसार, राज्य की बेरोजगारी दर 2.2 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत (3.2 प्रतिशत) से कम है।
कोलकाता देश की तीसरी सबसे बड़ी शहरी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। फिर भी, ये आंकड़े गहरे संरचनात्मक मुद्दों को छिपाते हैं। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, बंगाल की प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद 1,63,467 रुपये है—जो तेलंगाना (3,87,623) और महाराष्ट्र (3,09,340) जैसे राज्यों से काफी नीचे है।
पिछले तीन दशकों में, दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों की तुलना में विनिर्माण और उच्च-मूल्य वाली सेवाओं में धीमी वृद्धि ने युवाओं को अवसरों की तलाश में पलायन के लिए मजबूर किया है। चुनौती केवल नौकरियां पैदा करना नहीं है, बल्कि उद्योगों का ऐसा संरचनात्मक परिवर्तन है जो विकास को बनाए रख सके और कुशल युवाओं को राज्य में रोक सके।
दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण के बावजूद, तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और माकपा के घोषणापत्रों में एक उल्लेखनीय समानता है। तीनों ही बंगाल की भविष्य की अर्थव्यवस्था के मुख्य स्तंभों के रूप में लॉजिस्टिक्स-आधारित विकास और बंदरगाह-आधारित विकास पर जोर देते हैं।
तृणमूल का घोषणापत्र एक दशक के भीतर बंगाल को भारत की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने और पांच वर्षों में 40 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था बनाने का महत्वाकांक्षी रोडमैप पेश करता है। इसमें 2031 तक 30 बिलियन अमेरिकी डॉलर का लॉजिस्टिक्स हब और 10 लाख नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य है।
भाजपा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के माध्यम से निवेश के माहौल को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करती है और ताज़पुर एवं कुलपी में गहरे समुद्री बंदरगाहों तथा हल्दिया में एक ब्लू इकोनॉमी हब का प्रस्ताव देती है। वे पांच साल में एक करोड़ लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर देने का वादा करते हैं। दूसरी ओर, वाम मोर्चा 40 लाख स्थायी नौकरियों का वादा करता है, जिसमें 25 लाख उद्योग और लॉजिस्टिक्स में और 15 लाख तकनीक आधारित नौकरियां शामिल हैं।
वे दुर्गापुर में एक अंतरराष्ट्रीय एयर कार्गो हब बनाने का प्रस्ताव देते हैं। एक और समानता बेरोजगारी भत्ते को लेकर है। टीएमसी युवा साथी योजना के तहत प्रति माह 1,500, वाम मोर्चा 2,000 और भाजपा 3,000 रुपये देने का वादा करती है। आय सहायता पर यह जोर युवाओं के महत्व को तो दर्शाता है, लेकिन यह संरचनात्मक आर्थिक चुनौतियों को केवल प्रतिस्पर्धी कल्याणवाद तक सीमित करने का जोखिम भी पैदा करता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये आर्थिक दृष्टिकोण बंगाल की बदलती जनसांख्यिकीय वास्तविकता की अनदेखी करते हैं। राज्य निम्न-प्रजनन दर और विलंबित जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर में प्रवेश कर चुका है। नमूना पंजीकरण सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, 2013 और 2023 के बीच बंगाल की कुल प्रजनन दर 17.6 प्रतिशत गिरकर 1.7 से लगभग 1.3 हो गई है—जो राष्ट्रीय औसत (1.9) से काफी कम है।
बंगाल का शहरी टीएफआर देश में सबसे कम है। यह बदलाव अर्थव्यवस्था को नया आकार देगा। कार्यशील आयु की आबादी में धीमी वृद्धि से कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों में श्रम की कमी हो सकती है, जबकि बुजुर्गों की बढ़ती आबादी स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सहायता की मांग बढ़ाएगी। घोषणापत्रों में, केवल वाम मोर्चा ही इस पर स्पष्ट बात करता है और हर उपमंडल में वृद्धाश्रम तथा हेल्पलाइन का प्रस्ताव देता है।
टीएमसी वृद्धावस्था पेंशन के विस्तार की बात करती है, जबकि भाजपा ने इस पर कोई विशिष्ट योजना नहीं दी है। दूसरी बड़ी प्रवृत्ति शहरीकरण है। लगभग 37 प्रतिशत आबादी पहले से ही शहरी क्षेत्रों में रह रही है, जो राष्ट्रीय औसत (35 प्रतिशत) से अधिक है। 2040 के दशक की शुरुआत तक बंगाल मुख्य रूप से शहरी राज्य बन जाएगा।
2011 में, पश्चिम बंगाल में 834 जनगणना शहर दर्ज किए गए थे—जो भारत में सबसे अधिक थे। फिर भी, यह परिवर्तन काफी हद तक अनियोजित है। उपजाऊ कृषि भूमि का शहरी उपयोग में बदलना और जल निकायों का नुकसान पर्यावरणीय तनाव को बढ़ा रहा है। 1,106 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी के जनसंख्या घनत्व के साथ, भूमि एक दुर्लभ संसाधन है जिसका अनुकूलन आवश्यक है। प्रथम मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र रॉय ने दुर्गापुर, कल्याणी और हल्दिया के नियोजित विकास की शुरुआत की थी। वह अनुभव आज एक महत्वपूर्ण सबक देता है।