साओ पाउलो स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण खोज
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सहजन एक भारतीय पौधा है
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इसके बीजों का बेहतर उपयोग है
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यह प्रकृति के अनुकूल उपाय भी है
राष्ट्रीय खबर
रांचीः ब्राजील के साओ पाउलो स्टेट यूनिवर्सिटी (आईसीटी-यूएनईएसपी) के शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण खोज की है। उनके अध्ययन के अनुसार, मोरिंगा ओलिफेरा जिसे आमतौर पर सहजन या मुनगा कहा जाता है, पानी से सूक्ष्म प्लास्टिक (माइक्रोप्लास्टिक्स) को हटाने में बेहद प्रभावी साबित हो सकता है। यह शोध अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के जर्नल एसीएस ओमेगा में प्रकाशित हुआ है।
सहजन मूल रूप से भारत का पौधा है और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में आसानी से पनपता है। इसके पोषण गुणों के कारण इसकी पत्तियों और बीजों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है। लेकिन वैज्ञानिक वर्षों से जल शोधन में इसके बीजों की क्षमता पर शोध कर रहे हैं। अध्ययन की मुख्य लेखिका गेब्रियल बतिस्ता के अनुसार, सहजन के बीजों से निकाला गया खारा अर्क बिल्कुल एल्युमीनियम सल्फेट की तरह काम करता है, जिसका उपयोग वर्तमान में जल उपचार संयंत्रों में किया जाता है। खास बात यह है कि क्षारीय पानी में तो यह रासायनिक उत्पादों से भी बेहतर परिणाम देता है।
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पानी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक्स पर नकारात्मक विद्युत आवेश होता है, जिससे वे एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं और फिल्टर में आसानी से नहीं फंसते। सहजन का अर्क इन आवेशों को बेअसर कर देता है। इससे प्लास्टिक के सूक्ष्म कण आपस में जुड़कर बड़े गुच्छे बना लेते हैं, जिन्हें रेत के फिल्टर के माध्यम से आसानी से अलग किया जा सकता है।
शोध टीम ने अपने प्रयोग के लिए नल के पानी में पीवीसी माइक्रोप्लास्टिक्स मिलाए। पीवीसी को मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे हानिकारक प्लास्टिक माना जाता है क्योंकि इसमें कैंसर पैदा करने वाले तत्व हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि सहजन का उपयोग करके इन कणों को उतनी ही प्रभावशीलता से हटाया जा सकता है जितना कि रसायनों से।
परियोजना के प्रमुख प्रोफेसर एड्रियानो गोंकाल्वेस डॉस रीस का कहना है कि एल्युमीनियम सल्फेट जैसे रसायनों का एक बड़ा नुकसान यह है कि वे पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल नहीं होते और उनके अवशेष स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं। इसके विपरीत, सहजन एक प्राकृतिक और टिकाऊ विकल्प है।
हालांकि बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से कार्बनिक पदार्थों में थोड़ी वृद्धि हो सकती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे समुदायों के लिए यह एक अत्यंत किफायती और कुशल तरीका है। वर्तमान में, इस तकनीक का परीक्षण साओ जोस डॉस कैंपोस की पराईबा डो सुल नदी के पानी पर किया जा रहा है, और अब तक के परिणाम काफी उत्साहजनक रहे हैं।
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