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अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं हेमंत सोरेन

राज्य सभा में सोरेन परिवार से कोई ?

  • कांग्रेस से रिश्ते काफी बिगड़े हुए हैं

  • दूसरे प्रत्याशी पर माथापच्ची जारी

  • भाजपा को दिल्ली से निर्देश मिलेगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव ने राज्य की राजनीति में गहरी हलचल पैदा कर दी है। यद्यपि संख्या बल के अनुसार, सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के प्रत्याशी की जीत लगभग तय मानी जा रही है और इसे लेकर पार्टी के भीतर कोई संशय नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदा कार्यशैली ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

वे अत्यंत संभलकर अपनी चाल चल रहे हैं, जिसे उनकी रणनीतिक चुप्पी के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री न केवल अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रख रहे हैं, बल्कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की आंतरिक राजनीति को भी गहराई से तौल रहे हैं, ताकि वे ऐसा फैसला ले सकें जो उनके राजनीतिक भविष्य के लिए सबसे उपयुक्त हो।

चुनाव की तारीखें नजदीक आने के बावजूद, झामुमो की ओर से प्रत्याशियों के नामों पर कोई औपचारिक चर्चा नहीं होने से पार्टी के अंदर यह धारणा मजबूत हो रही है कि अंततः पहली सीट के लिए सोरेन परिवार से ही किसी एक को मैदान में उतारा जाएगा।

इस राजनीतिक बिसात में कांग्रेस की स्थिति सबसे ज्यादा नाजुक नजर आ रही है। कांग्रेस प्रभारी राजू ने हाल ही में रांची का दौरा किया और हेमंत सोरेन से मुलाकात की, लेकिन यह दौरा मुख्यमंत्री के रुख को प्रभावित करने में पूरी तरह विफल रहा। झामुमो के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि पश्चिम बंगाल और असम के पिछले चुनावों में कांग्रेस का जो आचरण रहा, उससे यह स्पष्ट है कि वह झामुमो को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में राज्य के बाहर बढ़ते हुए नहीं देखना चाहती। झामुमो के नेताओं का तर्क है कि जब कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को कुचलने की राजनीति कर रही है, तो ऐसे में झामुमो अपने विधायकों के कीमती वोट कांग्रेस को क्यों दे। यह दृष्टिकोण गठबंधन की एकता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

कांग्रेस की आंतरिक स्थिति भी बेहद तनावपूर्ण है। राज्यसभा टिकट के लिए दावेदारी करने वाले एक प्रमुख नेता के विरोधियों ने उन पर तीखा तंज कसा है कि जो व्यक्ति अपने क्षेत्र के एक बूथ पर महज सौ वोट भी हासिल नहीं कर सकता, वह राज्यसभा में क्या गुल खिलायेगा, यह जगजाहिर है। कांग्रेस के दूसरे गुट के अनुसार, ऐसे लोग कांग्रेस के लिए एक बोझ बन गए हैं, जिन्हें तत्कालीन प्रभारी आरपीएन सिंह पार्टी पर लाद गए थे। यह गुट आरोप लगाता है कि ये नेता कुछ भ्रष्ट आईएएस अफसरों और बड़े बिल्डरों की कृपा से अपनी राजनीति चला रहे हैं और जमीन से पूरी तरह कट चुके हैं। यह आंतरिक अंतर्द्वंद्व कांग्रेस की मोलभाव करने की शक्ति को और कमजोर कर रहा है।