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काफी दिनों बाद बिहार की आईएएस लॉबी के अंदर घबड़ाहट

एडीजी पंकज दाराद की कार्रवाई से हड़कंप

  • रिशु श्री की चर्चा फिर से होने लगी

  • किन रसूखदार लोगों से था संपर्क

  • बेचैनी की झलक साफ मिल रही

दीपक नौरंगी

पटनाः बिहार में टेंडर घोटाले और चर्चित ठेकेदार रिशु श्री से जुड़े मामलों ने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। विशेष निगरानी इकाई द्वारा की जा रही ताबड़तोड़ कार्रवाई के केंद्र में 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी और एडीजी पंकज कुमार दाराद का नाम प्रमुखता से चर्चा में है। उनकी नेतृत्व शैली और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख ने नौकरशाही में हलचल पैदा कर दी है।

पिछले 15 महीनों में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के बाद अब विशेष निगरानी इकाई की सक्रियता ने जांच को एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। दो आईएएस अधिकारियों के निलंबन और कई विभागों की फाइलों की पड़ताल ने स्पष्ट कर दिया है कि जांच का दायरा अब रसूखदार लोगों तक पहुँच रहा है। चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले कुछ उच्च अधिकारियों पर भी गाज गिर सकती है।

इस घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। लोग व्यंग्यात्मक रूप से पर्दे में रहने दो और पैसा बोलता है जैसे गीतों का हवाला देकर प्रशासनिक भ्रष्टाचार के गहरे नेटवर्क की ओर इशारा कर रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई केवल सरकार की छवि सुधारने का प्रयास है या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक वास्तविक सर्जिकल स्ट्राइक।

रिशु श्री की प्रशासनिक और राजनीतिक पहुंच किसी से छिपी नहीं रही है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या रिशु श्री कानूनी शिकंजे में लंबे समय तक रहेगा या अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बाहर आ जाएगा। केंद्र की जांच एजेंसियों की पैनी नजर और राज्य स्तर पर पंकज दाराद की सक्रियता ने उन प्रभावशाली लोगों के लिए मुसीबतें बढ़ा दी हैं, जो अब तक पर्दे के पीछे रहकर प्रशासनिक तंत्र को नियंत्रित करते रहे हैं। फिलहाल, यह जांच अब केवल एक टेंडर घोटाले तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह बिहार की सत्ता और नौकरशाही के गठजोड़ की पोल खोलने वाला एक बड़ा प्रकरण बन चुका है। जांच के आने वाले परिणाम राज्य की भविष्य की प्रशासनिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।