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लोकतंत्र पर जबरन कब्जे की नई तकनीक है कृत्रिम बुद्धिमत्ता, देखें वीडियो

ए आई की भीड़ सोच पर कब्जा कर सकती है

  • भीड़ में जनता की राय बदल देते हैं

  • लोगों को लगता है कि यह सच है

  • जनता की सोच पर नियंत्रण की चाल

राष्ट्रीय खबर

रांचीः आज के डिजिटल युग में लोकतंत्र के सामने एक ऐसी चुनौती उभर रही है जो पारंपरिक विरोध प्रदर्शनों या पुराने दौर के वोटर मैनिपुलेशन से कहीं अधिक सूक्ष्म और खतरनाक है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि एआई-नियंत्रित अत्यधिक यथार्थवादी कृत्रिम व्यक्तित्व सार्वजनिक राय को आकार देने और लोकतांत्रिक प्रणालियों को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब इतनी गोपनीयता से हो सकता है कि किसी को इसका आभास तक न हो। वैसे आप सोशल मीडिया पर खास किस्म का प्रचार करने वाले लोगों के प्रोफाइल को जब चेक करेंगे तो पता चलेगा कि उन्होंने अपना प्रोफाइल बंद कर रखा है। इससे आप सच को समझ सकते हैं।

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हाल ही में प्रसिद्ध जर्नल सायंस में प्रकाशित एक पॉलिसी फोरम पेपर में बताया गया है कि कैसे एआई द्वारा निर्मित किरदारों के बड़े समूह ऑनलाइन दुनिया में इंसानी व्यवहार की सटीक नकल कर सकते हैं। ये सिस्टम डिजिटल समुदायों में प्रवेश कर सकते हैं, चर्चाओं में भाग ले सकते हैं और असाधारण गति से लोगों के दृष्टिकोण को बदल सकते हैं। पुराने बॉट नेटवर्क्स के विपरीत, ये नए एआई एजेंट आपस में तत्काल समन्वय कर सकते हैं, फीडबैक पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं और हजारों खातों के माध्यम से एक ही विमर्श को मजबूती से बनाए रख सकते हैं।

लार्ज लैंग्वेज मॉडल और मल्टी-एजेंट सिस्टम में हो रही तीव्र प्रगति ने अब यह संभव कर दिया है कि एक अकेला ऑपरेटर एआई आवाजों के विशाल नेटवर्क को नियंत्रित कर सके। ये व्यक्तित्व इतने प्रामाणिक लगते हैं कि वे स्थानीय भाषा और लहजे को अपनाकर अन्य उपयोगकर्ताओं के साथ स्वाभाविक रूप से बातचीत करते हैं।

इसके अलावा, ये सिस्टम लाखों छोटे पैमाने के प्रयोग करके यह पता लगा सकते हैं कि कौन सा संदेश सबसे अधिक प्रभावशाली है। इससे उन्हें रीयल-टाइम में अपनी रणनीति सुधारने और एक कृत्रिम जनमत तैयार करने में मदद मिलती है, जो वास्तव में केवल एक राजनीतिक एजेंडा होता है।

यद्यपि पूर्ण विकसित एआई स्वार्म अभी भी काफी हद तक सैद्धांतिक हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। कंप्यूटर वैज्ञानिक डॉ. केविन लेटन-ब्राउन के अनुसार, अमेरिका, ताइवान, इंडोनेशिया और भारत जैसे देशों में हालिया चुनाव चर्चाओं को प्रभावित करने वाले डीपफेक और नकली समाचार आउटलेट इसके शुरुआती उदाहरण हैं। साथ ही, कुछ नेटवर्क भविष्य के एआई सिस्टम को प्रशिक्षित करने वाले डेटा को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आने वाले समय में ये तकनीकें एक विशेष विचारधारा को प्राथमिकता दें।

विशेषज्ञों का मानना है कि एआई स्वार्म लोकतांत्रिक समाजों में सत्ता के संतुलन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकते हैं। डॉ. लेटन-ब्राउन ने चेतावनी दी है कि इससे सोशल मीडिया पर अनजान आवाजों पर भरोसा कम हो जाएगा, जिससे केवल मशहूर हस्तियां शक्तिशाली होंगी और जमीनी स्तर के संदेशों के लिए आगे बढ़ना कठिन हो जाएगा। आगामी चुनाव इस तकनीक के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण होंगे। सबसे बड़ी चुनौती इन अभियानों को पहचानना और इन्हें अनियंत्रित होने से पहले रोकना है।

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