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पिनाराई विजयन ने केंद्र पर साधा निशाना

परिसीमन विधेयक 2026 पर दक्षिण भारत की चिंता

  • इस खेल को दक्षिण समझ रहा है

  • अपना दबदबा कायम रखने की साजिश

  • बिना आम सहमति के जल्दबाजी क्यों

राष्ट्रीय खबर

तिरुवनंतपुरम: केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन विधेयक 2026 की तीखी आलोचना की है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि यह विधेयक देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने और उत्तर भारतीय राज्यों के जनसंख्या-आधारित राजनीतिक प्रभुत्व को लोकसभा सीटों में बदलने की एक सोची-समझी साजिश है। उन्होंने केंद्र सरकार पर राज्य सरकारों के साथ बिना किसी आम सहमति बनाए इस महत्वपूर्ण कानून को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है।

मुख्यमंत्री ने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया को केवल एक नियमित प्रशासनिक सुधार मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस विधेयक को लाने की जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि केंद्र सरकार इसे ऐसे समय में ला रही है जब देश के दो प्रमुख राज्य चुनावों की ओर बढ़ रहे हैं। विजयन के अनुसार, राज्यों की राय लिए बिना कानून थोपना भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है।

इस विवाद का मुख्य कारण परिसीमन प्रक्रिया का जनसंख्या से जुड़ा होना है। पिनाराई विजयन ने संदेह जताया कि यह उत्तरी राज्यों की बड़ी आबादी को दीर्घकालिक सत्ता सुरक्षित करने के लिए लोकसभा सीटों में बदलने का प्रयास है। उन्होंने कहा, व्यापक संदेह है कि यह जनसंख्या के आधार पर उत्तरी राज्यों के राजनीतिक वर्चस्व को लोकसभा सीटों में बदलने और इसके माध्यम से लंबे समय तक सत्ता हथियाने की कोशिश है।

विजयन ने इस बात पर जोर दिया कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने से उन दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया है। यदि लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर होता है, तो दक्षिण भारत की सीटों की हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी। मुख्यमंत्री ने इसे समान न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन बताया।

विजयन ने परिसीमन को महिला आरक्षण के कार्यान्वयन से जोड़ने की रणनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने मांग की कि महिला आरक्षण को स्वतंत्र रूप से लागू किया जाना चाहिए, न कि इसे परिसीमन या जनगणना के साथ जोड़कर जटिल बनाया जाए। उनका तर्क है कि दक्षिणी राज्यों को उनके द्वारा किए गए सामाजिक सुधारों और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इस मुद्दे पर एकजुट होकर केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोलने और व्यापक परामर्श की मांग की है।