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भारतीय चुनाव पर अब धनपशुओं का कब्जा

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनकी दूरदर्शिता आज के समय में किसी चेतावनी की तरह महसूस होती है। पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. प्रफुल्ल चंद्र घोष (1891-1983) उन्हीं में से एक थे। एक प्रखर गांधीवादी और ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए जो सपना देखा था, वह आज चुनावी विसंगतियों के शोर में कहीं दब गया है।

आजादी के 79वें वर्ष में प्रवेश करते हुए जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उनके द्वारा दी गई लोकतंत्र बनाम धनतंत्र की चेतावनी आज के राजनीतिक परिदृश्य, विशेषकर रांची नगर निगम जैसे स्थानीय निकाय चुनावों में अक्षरशः सच साबित होती दिख रही है। प्रफुल्ल चंद्र घोष का मानना था कि एक आदर्श शासन व्यवस्था वह है जहाँ न्यूनतम शासन हो और व्यक्ति का विकास बिना किसी दमन के हो सके।

लेकिन वर्तमान वास्तविकता इसके उलट है। आज समाज में दो ऐसी श्रेणियाँ सक्रिय हैं जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही हैं। पहली श्रेणी उन लोगों की है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं का उपयोग केवल अपने व्यक्तिगत और समूहगत आर्थिक हितों को साधने के लिए करते हैं। दूसरी श्रेणी उन तत्वों की है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर एक अदृश्य तानाशाही थोपना चाहते हैं, जहाँ जनता को केवल भ्रमित करने के लिए लोकलुभावन वादे किए जाते हैं।

झारखंड की राजधानी रांची में नगर निगम के चुनावों ने हाल के वर्षों में जो स्वरूप अख्तियार किया है, वह चिंताजनक है। नगर निगम का चुनाव बुनियादी तौर पर नाली, सड़क, साफ-सफाई और स्थानीय नागरिक सुविधाओं के लिए होता है। लेकिन अब यह चुनाव पार्षद बनने की होड़ से कहीं अधिक निवेश का जरिया बन गया है।

उम्मीदवारों का वास्तविक खर्च चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित आधिकारिक सीमा से कई गुना अधिक है। शहर के चौक-चौराहों पर लगे विशाल होर्डिंग्स, चमचमाते पोस्टर और सोशल मीडिया पर चलने वाले महंगे कैंपेन इस बात का प्रमाण हैं कि अब सेवा का भाव गौण हो चुका है।

यहाँ तक कि रांची के कुछ वार्डों से ऐसी खबरें भी आईं कि चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं, विशेषकर महिलाओं को प्रभावित करने के लिए रात के अंधेरे में सोने के आभूषण, महंगी साड़ियाँ और नकद राशि बांटी गई। जब एक प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए एक करोड़ रुपये या उससे अधिक का दांव लगाता है, तो वह लोकतंत्र नहीं बल्कि अमीरों का जुआ बन जाता है।

जब चुनावी जीत की नींव ही करोड़ों के खर्च और अनैतिक वितरण पर टिकी हो, तो उसके परिणाम भी उतने ही घातक होते हैं। इस स्थिति में, नगर निगम के विकास कार्यों के लिए आने वाला फंड बंदरबांट की भेंट चढ़ जाता है। परिणामस्वरूप, जनता की बुनियादी जरूरतें प्राथमिकताओं की सूची से बाहर हो जाती हैं और शहर की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।

डॉ. घोष ने 1967 के आसपास कुछ क्रांतिकारी सुझाव दिए थे, जो आज के डिजिटल युग में भी रांची जैसे शहरी निकायों के लिए एक बेहतरीन मॉडल साबित हो सकते हैं। उनके सुझावों का सार था—चुनाव को खर्चीला होने से रोकना। उम्मीदवार व्यक्तिगत रूप से पोस्टर या पंपलेट न छपवाएं। सरकार सभी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता, सामाजिक योगदान और उनके विजन (घोषणापत्र) को एक संक्षिप्त पत्रक में छपवाकर हर मतदाता के घर तक पहुंचाए।

इसके लिए उम्मीदवारों से एक न्यूनतम शुल्क लिया जा सकता है। प्रफुल्ल बाबू का मानना था कि घर-घर जाकर वोट मांगना अक्सर दबाव या प्रलोभन का जरिया बनता है। इसकी जगह वार्ड के सार्वजनिक स्थलों पर 10-12 साझा सभाएं हों, जहाँ सभी उम्मीदवार एक ही मंच से जनता को संबोधित करें और जनता उनसे सीधे सवाल पूछे।

मतदान के दिन बूथ के बाहर लगने वाले राजनीतिक दलों के बस्ते और शिविरों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इससे मतदाता बिना किसी मानसिक दबाव या डर के अपनी स्वेच्छा से मतदान कर सकेगा। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ेगी, चुनावी भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन प्रफुल्ल चंद्र घोष ने इस पर एक बहुत ही कड़वी सच्चाई बयान की थी।

उन्होंने उदाहरण दिया था कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में कोलकाता जैसे शिक्षित महानगरों में चुनावी खर्च कहीं ज्यादा है। आज रांची के संदर्भ में भी यही सच है। शिक्षित मतदाता होने के बावजूद यहाँ का चुनाव अधिक खर्चीला और जटिल है। इसका सीधा अर्थ है कि समस्या साक्षरता की कमी नहीं, बल्कि राजनैतिक नैतिकता और सत्यनिष्ठा का अभाव है।

प्रफुल्ल चंद्र घोष के आदर्श आज इतिहास के पन्नों और उनकी पुरानी चिट्ठियों में कैद होकर रह गए हैं। लेकिन रांची नगर निगम के भविष्य के लिए इन आदर्शों को धूल झाड़कर बाहर निकालना अनिवार्य है। हमें यह समझना होगा कि यदि हम सोने के आभूषण या चंद रुपयों के बदले अपना वोट बेचते हैं, तो हम अगले पांच वर्षों के लिए अपने वार्ड का विकास भी बेच देते हैं।