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दस लाख मतदाता मामलों को दी मंजूरी

अंतिम जांच में ई-हस्ताक्षर की चूक पायी गयी

  • तकनीकी खामी और अनिवार्य प्रक्रिया

  • डेटा और विलोपन का प्रभाव दिखा है

  • 41 फीसद मतदाताओं के नाम हटाये गये

राष्ट्रीय खबर

कोलकाता: निर्वाचन आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पहले पूरक प्रकाशन में एक बड़ी तकनीकी बाधा सामने आई है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, विचाराधीन 29 लाख मामलों में से केवल 10 लाख मामलों का परिणाम ही पहली सूची में प्रकाशित किया जा सका है। शेष 19 लाख मामले न्यायिक अधिकारियों के ई-हस्ताक्षर की कमी के कारण अटक गए हैं।

चुनाव आयोग के सूत्रों ने बुधवार को स्पष्ट किया कि सोमवार को प्रकाशित पहली पूरक सूची में शामिल किए गए नामों में से लगभग 41 प्रतिशत मतदाताओं के नाम दस्तावेजों की कमी के कारण हटा दिए गए थे।

आयोग ने सोमवार तक कुल 29 लाख मामलों का निपटारा कर लिया था, जिन्हें 705 न्यायिक अधिकारियों द्वारा देखा गया था। हालांकि, इनमें से केवल 10 लाख मामलों में ही न्यायिक अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर मौजूद थे। निर्वाचन नियमों के अनुसार, किसी भी मामले के आधिकारिक निपटान और सूची में शामिल करने के लिए संबंधित न्यायिक अधिकारी का ई-हस्ताक्षर अनिवार्य है।

आयोग के एक सूत्र ने बताया, यही कारण है कि पहली पूरक सूची में केवल 10 लाख नाम ही शामिल किए जा सके। बिना ई-हस्ताक्षर के किसी भी डेटा को अंतिम रूप देना कानूनी रूप से वैध नहीं माना जाता।

हालांकि आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस एड-ऑन सूची को प्रकाशित करते समय कुल कितने मतदाताओं को जोड़ा गया या हटाया गया, लेकिन दस्तावेजों की कमी एक बड़ा कारण बनकर उभरी है। लगभग 41 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटाए जाने से राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। अधिकारी अब शेष 19 लाख मामलों में तकनीकी खामियों को सुधारने और न्यायिक अधिकारियों के हस्ताक्षर प्राप्त करने की प्रक्रिया में जुटे हैं, ताकि अगले चरणों में डेटा को पूर्ण रूप से अद्यतन किया जा सके। यह घटनाक्रम चुनाव से पहले मतदाता सूची की शुद्धता और डिजिटल सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।