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भाषण से भरोसा अब नहीं आ पायेगा

भारतीय परीक्षा प्रणाली में शीर्ष स्वायत्त निकाय के रूप में स्थापित नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की कार्यप्रणाली लगातार गंभीर आलोचना के घेरे में बनी हुई है। देश के लाखों युवाओं के भविष्य का निर्धारण करने वाली इस संस्था द्वारा परीक्षाओं के आयोजन में की जाने वाली त्रुटियां और लापरवाही अब एक स्थायी प्रवृत्ति का रूप लेती जा रही हैं।

देश की विभिन्न महत्वपूर्ण प्रवेश और पात्रता परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी गंभीर घटनाओं को रोकने में पूरी तरह विफल रहने के उपरांत, इस एजेंसी को एक बार फिर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। इस बार एनटीए को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन-नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (यूजीसी-नेट) के अंतर्गत अंग्रेजी, वाणिज्य (कॉमर्स) और समाजशास्त्र (सोशियोलॉजी) विषयों के प्रश्नपत्रों को रद्द करते हुए दोबारा परीक्षा आयोजित कराने के लिए विवश होना पड़ा है।

यूजीसी-नेट परीक्षा भारतीय उच्च शिक्षा तंत्र में अत्यधिक महत्व रखती है। यह परीक्षा भारतीय विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश तथा प्रतिष्ठित जूनियर रिसर्च फेलोशिप के आवंटन का एकमात्र पैमाना है। इसके अतिरिक्त, यह देश भर के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर नियुक्ति के लिए न्यूनतम पात्रता का निर्धारण करती है। ऐसी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील परीक्षा में इस प्रकार की धांधली और प्रशासनिक अक्षमता न केवल संस्था की कार्यकुशलता पर सवालिया निशान लगाती है, बल्कि इसमें भाग लेने वाले शोधार्थियों और विद्यार्थियों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ भी करती है।

इन परीक्षाओं के रद्द होने और नए सिरे से होने वाली पुन: परीक्षाओं के कारण छात्रों को भारी मानसिक तनाव, शैक्षणिक अनिश्चितता और अत्यधिक थकान का सामना करना पड़ रहा है। पुन: आयोजित की जाने वाली इन परीक्षाओं में पूर्ववर्ती परीक्षाओं के प्रश्नों को बड़े पैमाने पर बिना किसी उचित समीक्षा के सीधे दोहराया गया था। विशेष तौर पर, समाजशास्त्र के प्रश्नपत्र की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इस प्रश्नपत्र में वर्तनी की अनगिनत अशुद्धियां थीं तथा ऐसे प्रश्नों को शामिल किया गया था जो निर्धारित पाठ्यक्रम से पूरी तरह बाहर और अप्रासंगिक थे।

इन शैक्षणिक और तकनीकी चूकों के अलावा, एनटीए की ओर से उत्तरकुंजियों को जारी करने में अत्यधिक और अनावश्यक विलंब किया गया। इस प्रशासनिक ढिलाई के परिणामस्वूप देश भर के विश्वविद्यालयों में आगामी शैक्षणिक सत्रों के लिए प्रवेश प्रक्रिया और शोध पंजीकरण कार्य समय पर पूरे न होने की आशंका उत्पन्न हो गई है।

सबसे अधिक आश्चर्यजनक और चिंताजनक तथ्य यह है कि इन सभी विसंगतियों और त्रुटियों की आधिकारिक सूचना परीक्षा संपन्न होने के तुरंत बाद ही एनटीए के संज्ञान में ला दी गई थी, परंतु संस्था के उत्तरदायित्वहीन अधिकारियों ने इन गंभीर शिकायतों पर हफ्तों तक कोई कार्रवाई नहीं की और फाइल को दबाकर बैठे रहे। इन तमाम घटनाओं ने एनटीए की पेशेवर दक्षता और पारदर्शिता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर पूरी तरह से वैध और गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

अब तक ऐसा देखा गया है कि जब-जब इस संस्था द्वारा कोई बड़ी गलती सामने आई है, तब-तब सरकार और एजेंसी के स्तर से केवल सतही और खोखले सुधारवादी वादे ही दोहराए गए हैं। इन दावों में प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी प्रणाली, प्रश्नपत्रों की आवाजाही के लिए जीपीएस ट्रैकिंग, और कुशल प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति जैसी तमाम बातें शामिल रही हैं। इसके अलावा, परीक्षाओं में होने वाली धांधलियों को रोकने के लिए सरकार द्वारा कड़े कानूनी और दंडात्मक उपाय भी अधिनियमित किए गए हैं। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि एनटीए की विफलताओं और गड़बड़ियों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है।

आज के इस दौर में इस संस्था की पूर्ण उदासीनता अत्यंत चिंताजनक है। देश के विभिन्न हिस्सों में पेपर लीक होने और परीक्षाओं के बार-बार रद्द होने के कारण छात्रों को भारी मानसिक और शारीरिक यातना झेलनी पड़ी है, यहां तक कि कुछ संवेदनशील मामलों में छात्रों की आत्महत्या जैसी दुखद घटनाएं भी सामने आई हैं। इन विकट परिस्थितियों के जवाब में, देश भर के जागरूक युवाओं ने एक अत्यंत सशक्त और जुझारू छात्र आंदोलन खड़ा किया।

इस आंदोलन ने सत्ता के स्तर पर आने वाली गंभीर बाधाओं और दमनकारी चुनौतियों का डटकर सामना किया और अंततः सफलता प्राप्त करते हुए तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बावजूद, एनटीए की कार्यशैली में कोई सुधार नहीं आया है। यह संस्था लगातार नए-नए घोटालों और गलतियों को अंजाम दे रही है, जिससे छात्र समुदाय की परेशानियां और अधिक बढ़ गई हैं। कार्यपालिका का इस स्वायत्त संस्था पर नियंत्रण और प्रभाव कभी भी संदेह के दायरे से बाहर नहीं रहा है। देश में एक नए शिक्षा मंत्री की नियुक्ति पहले ही हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर एनटीए अपनी कार्यप्रणाली में कब सुधार लाएगी और कब पूरी पारदर्शिता के साथ परीक्षाएं आयोजित करना सीखेगी?