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बड़बोलेपन का शिकार राजनीतिक गणित और बंगाल की आस्था

पश्चिम बंगाल की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक पहचान के बीच का संतुलन हमेशा अत्यंत संवेदनशील रहा है। हाल ही में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री उर्फ बाबा बागेश्वर द्वारा पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक और प्राणवान दुर्गापूजा परंपरा को लेकर दिए गए विवादास्पद बयान ने एक नया राजनीतिक और सांस्कृतिक बवंडर खड़ा कर दिया है।

हिंदू धर्म, संस्कृति और स्थानीय रीति-रिवाजों के बुनियादी ज्ञान के अभाव में दिया गया यह बयान न केवल उनकी अपनी गरिमा पर सवाल उठाता है, बल्कि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए भी भारी गले की फांस बन चुका है। बंगाली के दुर्गापूजा के प्राचीन इतिहास कई सौ वर्ष पुराना है।

लेकिन इसका वर्तमान स्वरुप प्रमुख कथावाचक और पुजारी स्वर्गीय वीरेंद्र कृष्ण भद्र के चंडीपाठ से प्रारंभ होकर विजयदशमी तक चलता है। इससे पहले वामपंथी सरकार ने भी पूर्ण बहुमत होने के दौरान इस महालया के आयोजन में बदलाव की कोशिश की थी। वीरेंद्र कृष्ण भद्र के चंडीपाठ के बदलकर नये विकल्प का प्रसारण हुआ था।

उसका इतना विरोध हुआ कि एक घंटे बाद फिर से पुरानी परंपरा का पालन किया गया।  दूसरों के मन की बात जानने और पर्ची खोलने के अपने दावों से सुर्खियों में रहने वाले धीरेंद्र शास्त्री ने इस बार अपनी बिना सोची-समझी टिप्पणी से भाजपा की ही राजनीतिक रणनीति की पर्ची खोलकर रख दी है। उन्होंने दुर्गापूजा के दौरान बंगाल के पारंपरिक खान-पान और उत्सव पद्धतियों पर एक खास विचारधारा या उत्तरी भारत के मानदंडों को थोपने का प्रयास किया।

यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि बाबा बागेश्वर को बंगाल के बहुआयामी और प्राचीन दुर्गापूजा के संस्कारों, तांत्रिक परंपराओं तथा शाक्त धर्म के रीति-रिवाजों का रत्ती भर भी बोध नहीं है।  बंगाल में दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है; यह बंगाली अस्मिता, दर्शन, कला और सामाजिक एकजुटता का सर्वोत्कृष्ट केंद्र है। शाक्त परंपरा के तहत देवी दुर्गा को घर की बेटी (उमा) के रूप में पूजा जाता है, जहाँ महाअष्टमी और महानवमी पर मां के भोग और अनुष्ठानों में मत्स्य तथा मांसाहार का भी विशेष स्थान रहा है।

स्वामी विवेकानंद से लेकर बंगाल के महापुरुषों ने स्थानीय सांस्कृतिक और खान-पान की विविधताओं को सहज रूप से स्वीकार किया है। जब कोई बाहरी धर्मगुरु या प्रचारक इस पावन पर्व पर अपनी संकीर्ण दृष्टि से फरमान जारी करता है, तो यह सीधे तौर पर बंगाली समुदाय के स्वाभिमान और सांस्कृतिक जड़ों पर चोट पहुँचाने जैसा प्रतीत होता है।

इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की मुश्किलें उस समय और अधिक बढ़ गईं जब राज्य के वरिष्ठ नेता और प्रतिपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी द्वारा धीरेंद्र शास्त्री का भव्य स्वागत किया गया। राजनीतिक मंचों पर बाबा बागेश्वर को संरक्षण और स्थान देने के कारण यह संदेश गया कि शायद उनके विचार भाजपा के वैचारिक एजेंडे से मेल खाते हैं।

भाजपा, जो लंबे समय से बंगाल में खुद को बंगाली संस्कृति के रक्षक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है और अपने ऊपर लगे बाहरी होने के तमगे को धोने का प्रयास कर रही है, उसके लिए यह स्थिति एक बहुत बड़ा झटका बनकर आई है।  नतीजतन, अब पश्चिम बंगाल भाजपा के शीर्ष नेताओं को आगे आकर न केवल इस बयान पर सफाई देनी पड़ रही है, बल्कि धीरेंद्र शास्त्री के बयानों का सार्वजनिक रूप से खंडन भी करना पड़ रहा है।

भाजपा के प्रदेश नेतृत्व को भली-भांति अंदाजा है कि यदि इस बयान को खारिज नहीं किया गया, तो तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां इसे बंगाली संस्कृति पर हमला बनाकर चुनाव दर चुनाव बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाएंगी। बंगाली जनमानस में अपनी पैठ खोने के डर से अब पार्टी नेता साफ कह रहे हैं कि धीरेंद्र शास्त्री का बयान उनकी अपनी व्यक्तिगत राय हो सकती है और पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

इस घटना से यह स्पष्ट सबक मिलता है कि अध्यात्म और आस्था का मंच जब अति-उत्साह और राजनीतिक आकाओं को खुश करने के बड़बोलेपन में तब्दील होता है, तो उसका परिणाम आत्मघाती ही होता है। किसी क्षेत्र के जनमानस पर प्रभाव बनाने के लिए वहां की लोक-परंपराओं, इतिहास और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का सम्मान करना अनिवार्य है।

बिना सोचे-समझे थोपी गई धार्मिक एकरूपता न केवल आस्था के विविध स्वरूपों को आघात पहुँचाती है, बल्कि उन राजनीतिक दलों को भी बैकफुट पर धकेल देती है जो ऐसे स्वयंभू धर्मगुरुओं की लोकप्रियता को भुनाने का दुस्साहस करते हैं। भाजपा के लिए बेहतर यही होगा कि वह अपने राजनीतिक एजेंडे को स्थापित करने के लिए क्षेत्रीय अस्मिता का आदर करे, न कि अपरिपक्व बयानों के दलदल में खुद को और उलझाए। वरना इस किस्म की अनर्थक बयानबाजी का राजनीतिक दुष्परिणाम बार बार सामने आता नजर आयेगा।