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फूंसी से फोड़ा बन रही है राजधानी की प्रमुख सड़कें

दुर्गापूजा के मौके पर ठेकेदारों की कमाई का मौका

अभी बहुत छोटे आकार के गड्डे हैं

अचानक से इनका टेंडर जारी होगा

कितना खर्च हुआ कोई हिसाब नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड की राजधानी रांची की सबसे महत्वपूर्ण और वीआईपी सड़कों में शुमार हरमू बाईपास सहित शहर की अन्य प्रमुख एवं व्यस्त सड़कों की स्थिति एक बार फिर चिंताजनक होती जा रही है। मॉनसून के इस मौसम में सड़कों पर छोटे-छोटे गड्ढे और दरारें उभरकर सामने आने लगी हैं। आगामी दुर्गापूजा के त्योहार को देखते हुए, विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों के कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित विभाग और ठेकेदार मन ही मन और अधिक मूसलाधार बारिश होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

इसके पीछे का सीधा गणित यह है कि जितनी अधिक बारिश होगी, सड़कों पर उभरे ये छोटे-छोटे गड्ढे धीरे-धीरे और विकराल रूप धारण करते चले जाएंगे। जब सड़कों की हालत फुंसी से फोड़े जैसी गंभीर हो जाएगी, तब आनन-फानन में इनकी त्वरित मरम्मत के नाम पर आपातकालीन टेंडर जारी किए जाएंगे। इसके बाद लीपापोती का काम कर सड़कों को दुर्गापूजा से ठीक पहले अस्थायी रूप से चमका दिया जाएगा।

इस तरह की तात्कालिक ठेकेदारी प्रक्रिया में प्रतिवर्ष कितना राजस्व खर्च होता है, इसका कोई पारदर्शी वार्षिक हिसाब-किताब सार्वजनिक नहीं किया जाता। नतीजतन, पांच रुपये के वास्तविक काम के नाम पर यदि पांच सौ रुपये भी खर्च दिखा दिए जाएं, तो इस प्रशासनिक और वित्तीय गड़बड़ी का सारा बोझ अंततः आम जनता की जेब और टैक्स के पैसों पर ही पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, अरगोड़ा चौक के निकट जलजमाव की पुरानी समस्या फिर से उत्पन्न हो गई है, जो इस विभागीय अनदेखी का प्रत्यक्ष नमूना है।

चालू मॉनसून के शुरुआती दिनों में शहर की लगभग सभी प्रमुख सड़कें सुचारू और ठीक-ठाक स्थिति में नजर आ रही थीं। परंतु समय बीतने के साथ, कई स्थानों पर अलकतरा (बिटुमेन) उखड़ने से छोटे-छोटे गड्ढे बनने शुरू हुए, जिनका आकार अब धीरे-धीरे विस्तृत होता जा रहा है। हालांकि, वर्तमान में ये गड्ढे बहुत विशाल आकार के नहीं हैं, लेकिन यदि एक-दो भारी बारिश और हो गई, तो हर साल की भांति इस बार भी सड़कों का रूप पूरी तरह से बिगड़ जाएगा।

हर वर्ष दुर्गापूजा के अवसर पर राज्य सरकार और जिला प्रशासन द्वारा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के कड़े निर्देश जारी किए जाते हैं। इन्हीं निर्देशों की आड़ में आपातकालीन मरम्मत के नाम पर भारी-भरकम राशि स्वीकृत कराई जाती है, जिसका नियमित या स्थाई विवरण सरकारी बहियों में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हो पाता। अंदरखाने का यह पूरा वित्तीय खेल आम नागरिकों की नजरों से हमेशा ओझल रहता है, क्योंकि त्योहार के समय जनता का मुख्य ध्यान केवल अच्छी सड़कों, निर्बाध बिजली आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्था तक ही सीमित रहता है।

लेकिन यह एक विचारणीय प्रश्न है कि जब सड़कों पर गड्ढे छोटे होते हैं, तब उनका स्थायी और बुनियादी सुधार क्यों नहीं किया जाता? पानी के रिसाव से जब सड़कें पूरी तरह टूटकर बड़े गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं, तभी जल्दबाजी में टेंडर आमंत्रित किए जाते हैं। इसके पीछे का खेल भले ही कागजों में छिपा हो, परंतु सड़क मरम्मत के नाम पर कौन लोग त्योहारों का वित्तीय लाभ कमा लेते हैं, यह बात अब किसी से छिपी नहीं है।