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अमान्य मतों की संख्या बढ़ने से बदला चुनावी गणित

बैलेट पेपर से मतदान बनी कई प्रत्याशियों के हार की  वजह

  • बैलेट पेपर से कई समीकरण ही बदल गये

  • लोगों ने एक  से अधिक मुहर लगा दिये

  • लोगों को इसकी जानकारी नहीं दी गयी थी

मनोज झा

रांची:  झारखंड राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में संपन्न कराए गए नगर निकाय चुनावों ने राज्य की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। इस बार नगर निगम के चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के बजाय पारंपरिक बैलेट पेपर (मतपत्र) का उपयोग किया गया। मतदान की इस पुरानी पद्धति ने न केवल चुनाव प्रक्रिया को धीमा किया, बल्कि कई प्रत्याशियों के जीत-हार के समीकरणों को भी पूरी तरह उलट कर रख दिया।

मतदान की पारंपरिक पद्धति अपनाने के कारण मतदाताओं को मतपत्र पर मुहर लगाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। आंकड़ों के अनुसार, इस प्रक्रिया में अमान्य मतों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई। मतगणना के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मतपत्र मिले जिन पर एक से अधिक स्थानों पर मुहर लगी थी या निशान सही तरीके से नहीं लगाया गया था।

चुनाव अधिकारियों ने स्वीकार किया कि बैलेट पेपर प्रणाली ईवीएम की तुलना में अधिक समय लेने वाली रही और मानवीय त्रुटियों की संभावना भी अधिक रही। विशेषकर ग्रामीण और कम शिक्षित मतदाताओं के बीच सही तरीके से मुहर न लगा पाने की समस्या प्रमुखता से सामने आई।

रांची नगर निगम के चुनाव परिणाम इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण हैं कि अमान्य मत कैसे निर्णायक साबित हो सकते हैं। मतगणना के दौरान कुल 26,501 मतों को अमान्य करार दिया गया। इन रद्द हुए वोटों ने कम से कम सात वार्डों के परिणामों को सीधे तौर पर प्रभावित किया।

प्रमुख वार्डों के आंकड़े:

वार्ड संख्या             जीत का अंतर        अमान्य मतों की संख्या

वार्ड-2                      97 वोट                     687 वोट

वार्ड-14                    96 वोट                    532 वोट

वार्ड-38                    26 वोट                    441 वोट

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि यदि अमान्य मतों का एक छोटा हिस्सा भी सही तरीके से डाला गया होता, तो चुनावी परिणाम बिल्कुल भिन्न हो सकते थे।

चुनाव परिणामों के बाद अब मतदान प्रणाली की विश्वसनीयता बनाम सुगमता पर बहस तेज हो गई है। जहाँ कुछ राजनीतिक दल बैलेट पेपर को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय मान रहे हैं, वहीं पराजित प्रत्याशियों के लिए यह पद्धति हार की सबसे बड़ी वजह बनकर उभरी है। मतगणना में हुई देरी और बड़ी संख्या में रद्द हुए वोटों ने भविष्य के चुनावों के लिए चुनाव आयोग के सामने मतदाता जागरूकता और तकनीकी चयन जैसी बड़ी चुनौतियां पेश कर दी हैं।