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एसआईआर में आधार कार्ड नहीं हटेगाः सुप्रीम कोर्ट

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का हवाला देते हुए इंकार किया

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया में पहचान प्रमाण के रूप में आधार कार्ड के उपयोग को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सितंबर 2025 के अपने पुराने आदेश में किसी भी तरह के बदलाव से मना करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम आधार को वैध पहचान पत्र मानता है, तब तक अदालत कानून के दायरे से बाहर नहीं जा सकती।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता-अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय को संबोधित करते हुए कहा कि यदि उन्हें लगता है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं, तो उन्हें अपनी शिकायतों के साथ केंद्र सरकार के पास जाना चाहिए।

पीठ ने रेखांकित किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23 के तहत, कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान स्थापित करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को अपना आधार नंबर दे सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, यदि आधार का फर्जीवाड़ा इतने बड़े स्तर पर हो रहा है जैसा कि आप कह रहे हैं, तो इसके लिए वैधानिक नियमन की आवश्यकता है। आप सरकार से इस अधिनियम में संशोधन की मांग करें, यह बार-बार अदालत में चर्चा का विषय नहीं हो सकता।

सुनवाई के दौरान श्री उपाध्याय ने तर्क दिया कि घुसपैठ भारत में इस कदर बढ़ चुकी है कि यह बाहरी आक्रमण का रूप ले चुकी है। उन्होंने दावा किया कि जब भी पुलिस बांग्लादेशियों या रोहिंग्याओं को पकड़ती है, तो उनके पास से बंगाल के पते वाले आधार कार्ड बरामद होते हैं। उन्होंने आधार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए इसे निजी एजेंसियों द्वारा आसानी से बनाया जाने वाला और फर्जीवाड़े के प्रति संवेदनशील दस्तावेज बताया।

हालांकि, अदालत ने इन तर्कों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आधार एक सार्वजनिक दस्तावेज है और जालसाजी किसी भी दस्तावेज (यहाँ तक कि पासपोर्ट) की भी की जा सकती है। निजी केंद्रों द्वारा आधार नामांकन की प्रक्रिया सरकार और वैधानिक अधिकारियों के तत्वावधान में ही की जाती है।

पिछले साल 8 सितंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि बिहार एसआईआर के दौरान सत्यापन के लिए आधार को 12वें सांकेतिक दस्तावेज के रूप में शामिल किया जाए। वर्तमान आदेश उसी रुख को बरकरार रखता है, जिससे स्पष्ट है कि चुनावी शुद्धता के लिए आधार का उपयोग जारी रहेगा।