Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Dewas Firecracker Factory Blast: देवास पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में मौतों का आंकड़ा हुआ 6, आरोपियों पर... Delhi Infrastructure: पीएम गतिशक्ति से मजबूत हुई दिल्ली की कनेक्टिविटी, 'इग्जेम्प्लर' श्रेणी में राज... LU Paper Leak Scandal: 'तुम्हारे लिए पेपर आउट करा दिया है', ऑडियो वायरल होने के बाद असिस्टेंट प्रोफे... Jaunpur News: सपा सांसद प्रिया सरोज की AI जेनरेटेड आपत्तिजनक फोटो वायरल, बीजेपी नेता समेत 2 पर FIR द... Kashmir Terror Hideout: बांदीपोरा में सुरक्षाबलों का बड़ा एक्शन, 'सर्च एंड डिस्ट्रॉय' ऑपरेशन में आतं... Delhi News: दिल्ली में सरकारी दफ्तरों का समय बदला, सीएम रेखा गुप्ता ने ईंधन बचाने के लिए लागू किए कड... Maharashtra IPS Transfer: महाराष्ट्र में 96 IPS अफसरों के तबादले, '12th Fail' वाले मनोज शर्मा बने मु... Aurangabad News: औरंगाबाद के सरकारी स्कूल में छात्रा से छेड़छाड़, टीसी देने के बहाने घर बुलाने का आर... Asansol Violence: आसनसोल में लाउडस्पीकर चेकिंग के दौरान बवाल, पुलिस चौकी पर पथराव और तोड़फोड़ Sabarimala Temple: सबरीमाला मंदिर के कपाट मासिक पूजा के लिए खुले, दर्शन के लिए वर्चुअल बुकिंग अनिवार...

चुनाव आयोग पर संस्थागत विश्वास का संकट

पिछले शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण  के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार और भारत निर्वाचन आयोग का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों के बीच हुई बहस काफी तीखी और गरमागरम रही। अदालत कक्ष में दोनों पक्षों की ओर से लगाए गए आरोपों, प्रत्यारोपों और शिकायतों की झड़ी को देखते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बहुत ही सटीक और मर्मभेदी टिप्पणी की।

अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह दोषारोपण का खेल दो संवैधानिक निकायों—बंगाल सरकार और चुनाव आयोग—के बीच मौजूद विश्वास की कमी का जीता-जागता प्रमाण है। संवैधानिक संस्थाओं के बीच यह गहरी खाई न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की कड़वी सच्चाई को भी उजागर करती है।

विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संपन्न हो चुकी है, लेकिन बंगाल में इन दो संवैधानिक निकायों के बीच जो स्पष्ट कटुता देखी गई, वह अन्य जगहों पर लगभग अनुपस्थित रही है। बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सरकार ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने मतदाताओं के नाम हटाने के प्रति एक विशेष झुकाव दिखाया है, जिससे एक बड़े वर्ग के मताधिकार पर खतरा मंडरा रहा है।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन आरोपों का खंडन करते हुए बंगाल के शासन पर चुनाव अधिकारियों को डराने-धमकाने और उनके काम में बाधा डालने का पलटवार किया है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग का रवैया अत्यधिक नौकरशाही, असंवेदनशील और यहाँ तक कि दबंगई भरा रहा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक पक्षपात और अलग-अलग चुनावी प्राथमिकताओं के कारण संस्थागत सहयोग की भावना पूरी तरह समाप्त हो गई है। संस्थागत विश्वास में इस तरह की कमी लोकतंत्र के लिए अवांछनीय है और यह सीधे तौर पर जनता के हितों के प्रतिकूल है।

दोनों पक्षों के बीच बढ़ते मतभेदों को देखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग द्वारा चिह्नित तार्किक विसंगतियों से उत्पन्न समस्याओं को हल करने के लिए पूर्व और वर्तमान न्यायिक प्रतिनिधियों को नियुक्त करने का निर्णय लिया। अदालत का उद्देश्य एक ऐसा मध्य मार्ग खोजना था जिससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता भी बनी रहे और किसी नागरिक का अधिकार भी न छीने।

हालांकि, बंगाल के प्रमुख राजनीतिक दलों का ध्यान अदालत द्वारा सुझाए गए समाधान से अधिक राजनीतिक लाभ बटोरने पर रहा है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों ही इस अदालती निर्देश से अपने लिए राजनीतिक लाभ खोजने में व्यस्त हैं। भाजपा ने न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के अदालत के फैसले को अपने प्रतिद्वंद्वी के लिए एक बड़े झटके के रूप में पेश करने की कोशिश की।

वहीं दूसरी ओर, ममता बनर्जी की पार्टी का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से चुनाव आयोग की किरकिरी हुई है और उसके स्वतंत्र कार्यबल पर सवाल खड़े हुए हैं। न्यायिक हस्तक्षेप का अपना महत्व हो सकता है, लेकिन यह तथ्य कि एक केंद्रीय संस्थान और एक राज्य सरकार के बीच विवाद को सुलझाने के लिए अदालत को बीच में आना पड़ा, हमारे प्रशासनिक सहयोग की संस्कृति पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच के ये तनावपूर्ण संबंध निश्चित रूप से देश के संघीय ढांचे को मजबूत नहीं करते।  जहाँ तक एसआईआर की प्रक्रिया का सवाल है, भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के परस्पर विरोधी दावों और अदालती लड़ाइयों के बावजूद, इसका वास्तविक मूल्यांकन केवल चुनावी परीक्षा के परिणामों से ही होगा।

अंततः, लोकतंत्र में जनता की अदालत ही यह तय करेगी कि इन संस्थागत विवादों का जमीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा है। इस तरह का संस्थागत टकराव न केवल चुनाव की निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता है, बल्कि मतदाताओं के मन में लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति संशय भी पैदा करता है। शीर्ष अदालत ने मामले को सुलझाने के लिए कोलकाता उच्च न्यायालय को निर्देश दिये हैं। जिसमें न्यायिक अधिकारी इन तमाम तार्किक विसंगतियों की जांच करेंगे।

आकलन के बाद यह पाया गया कि इस काम को पूरा करने के लिए पश्चिम बंगाल के पास इतने न्यायिक अधिकारी नहीं है। लिहाजा ओड़िशा और झारखंड से न्यायिक अधिकारियों की मदद लेने का नया निर्देश जारी किया गया। इससे और कुछ नहीं तो यह स्पष्ट है कि पहली बार चुनाव आयोग खुद ही विश्वसनीयता के संकट से पीड़ित हो चुका है।

देश में चुनाव आयोग पर पक्षपात और दूसरे किस्म के आरोप पहले भी लगे हैं। यह पहला मौका है जब चुनाव आयोग को ही भाजपा के एजेंट के तौर पर पुकारा जा रहा है। यहां से जो सवाल उत्पन्न होता है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अनौपचारिक तौर पर खुद के दिल्ली में होने का बयान जारी करने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार जनता से कन्नी काटकर क्यों चल रहे हैं।