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प्राचीन कविताओं ने वैज्ञानिकों की पुरानी धारणाओँ को दी चुनौती

इन मराठी शब्दों का मर्म अब जाकर समझ में आया

  • बबूल के पेड़ का विवरण समझा गया

  • विशाल घास के जंगल का पर्यावरण

  • जैव विविधता का संकेत छिपा है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पश्चिमी और मध्य भारत में करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली मराठी भाषा के सबसे पुराने ज्ञात लेखन में, 13वीं शताब्दी के धार्मिक गुरु चक्रधर स्वामी ने बबूल के पेड़ को मृत्यु और पुनर्जन्म के प्रतीक के रूप में उल्लेखित किया है। हालाँकि उनके शब्दों का उद्देश्य आध्यात्मिक अर्थ व्यक्त करना था, लेकिन सदियों बाद आज इनका एक नया वैज्ञानिक महत्व सामने आया है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार के लेखन भारत के प्राकृतिक परिदृश्य के लंबे इतिहास को समझने में मदद कर सकते हैं। प्राचीन कहानियाँ, कविताएँ और लोकगीत इस बात के सुराग दे सकते हैं कि इस क्षेत्र में विशाल सवाना और घास के मैदान कैसे बने और सदियों तक टिके रहे।

सवाना और घास के मैदान भारत के लगभग 10 फीसद और पृथ्वी की सतह के एक-तिहाई से अधिक हिस्से को कवर करते हैं। दशकों से, कई वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं का मानना था कि ये खुले क्षेत्र कभी घने जंगल थे, जिन्हें मानवीय गतिविधियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था। इसी धारणा ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण जैसी संरक्षण रणनीतियों को आकार दिया है।

लेकिन नया शोध एक अलग कहानी बतलाता है। ऐतिहासिक साहित्य के साक्ष्य संकेत देते हैं कि उष्णकटिबंधीय घास के मैदान बर्बाद हुए जंगल नहीं हैं, बल्कि अपने आप में एक प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र हैं। यह अंतर यह तय करने के लिए महत्वपूर्ण है कि वनीकरण के प्रयास कहाँ केंद्रित होने चाहिए।

एक अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने पश्चिमी भारत की ऐतिहासिक कथाओं में पौधों के संदर्भों की जांच की। मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के लेखक आशीष नेर्लेकर ने कहा, मेरे लिए सबसे बड़ी बात यह है कि चीजें कितनी कम बदली हैं। यह देखना दिलचस्प है कि सैकड़ों साल पुरानी चीजें आज के परिवेश से इतनी मेल खाती हैं।

इस शोध की शुरुआत शोधकर्ताओं के बीच अनौपचारिक बातचीत से हुई। पुणे के आईआईएसईआर में पुरातत्व के छात्र दिग्विजय पाटिल ने संस्कृत और मराठी ग्रंथों का अध्ययन करते समय असामान्य पौधों के बार-बार उल्लेख पर ध्यान दिया। वनस्पति वैज्ञानिक नेर्लेकर ने पहचाना कि इनमें से कई पौधे वही प्रजातियाँ हैं जो आज भी सवाना में पाई जाती हैं।

लोकगीतों और कविताओं से मानचित्रण टीम ने 13वीं शताब्दी तक के मराठी लोकगीतों और मिथकों की समीक्षा की। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों में 44 जंगली पौधों की प्रजातियों की पहचान की, जिनमें से लगभग दो-तिहाई सवाना पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विशिष्ट हैं। उदाहरण के लिए, 16वीं शताब्दी की कविता आदि पर्व में नीरा नदी घाटी के कांटेदार और खाली होने का वर्णन मिलता है, जहाँ चरवाहे अपनी गायों के लिए समृद्ध घास की तलाश में आते थे।

निष्कर्ष और महत्व ये ऐतिहासिक वृत्तांत बताते हैं कि भारत के सवाना कम से कम 750 वर्षों से अस्तित्व में हैं। जीवाश्म पराग और दरियाई घोड़े जैसे घास खाने वाले जानवरों के अवशेष भी संकेत देते हैं कि यहाँ हजारों साल पहले घास के मैदानों का ही दबदबा था। नेर्लेकर के अनुसार, सवाना को बचाना महत्वपूर्ण है क्योंकि ये 200 से अधिक ऐसी पौधों की प्रजातियों का घर हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं पाई जातीं। यदि हम जलवायु समाधान के नाम पर उन जगहों पर पेड़ लगाते हैं जहाँ कभी जंगल थे ही नहीं, तो हम एक मूल्यवान जैव विविधता को खो सकते हैं।

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