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कायस्थ परिवार में जन्मे थे वीरेंद्र कृष्ण भद्र

दुर्गापूजा के पूर्व महालया का चंडीपाठ आज भी लोकप्रिय

  • सुबह स्नान कर ही इसमें बैठते थे

  • ब्राह्मण समाज के आपत्ति जतायी थी

  • चंडीपाठ में आज भी कोई विकल्प नहीं आया

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः यूं तो अब हिंदीभाषी प्रदेशों में भी महालया लोकप्रिय हो गया है पर आज से तीन दशक पहले यह दुर्गापूजा के आगमन का बंगालियों का सूचक था। इसका आकर्षण इतना अधिक था कि लोग अपने अपने घरों में स्नान कर लेने के बाद घर के रेडियो के सामने बैठ जाते थे।

बाद में यह प्रथा बदली तो सार्वजनिक दुर्गापूजा के स्थान से माइक पर इसका प्रसारण होने लगे। आकाशवाणी में इसके प्रसारण के लिए सभी कलाकर एक दिन पहले ही आकाशवाणी के स्टूडियो में पहुंच जाते थे।

यह कार्यक्रम लाइव प्रसारित होता था, इसलिए कार्यक्रम प्रारंभ करने के पहले सभी के लिए स्नान करना भी आवश्यक था। इस पूरे कार्यक्रम का मूल आकर्षण चंडी पाठ ही था, जो आज भी कान में आने पर शरीर के रोंगटे खड़े कर देता है। बदले परिवेश में अब सोशल मीडिया और यूट्यूब पर भी यह कार्यक्रम उपलब्ध है।

इस आयोजन के मूल कर्णधार वीरेंद्र कृष्ण भद्र ही थे जो जाति से कायस्थ थे। उस दौर के ब्राह्म समाज की ताकत को अपनी वाणी से परास्त कर उन्होंने चंडीपाठ पर अपना यह एकाधिकार स्थापित किया था। आकाशवाणी में एक बार उनके कार्यक्रम का विकल्प पेश  करने की कोशिश भी की गयी थी पर जनता की नाराजगी को भांपते हुए पुराने कार्यक्रम का तुरंत ही दोबारा प्रसारण किया गया। उसके बाद से कभी भी इस धार्मिक कार्यक्रम में नया कुछ प्रयोग करने का साहस कोई नहीं कर पाया है।

महालया के दिन अगर आप महिषासुरमर्दिनी नहीं सुनते, तो यह दिन अधूरा है। और महिषासुरमर्दिनी और वह व्यक्ति जो आज इसका पर्याय बन गया है, वह हैं वीरेंद्र कृष्ण भद्र। चंडीपाठ उनके लिए एक काँटा है। लेकिन एक कायस्थ के रूप में वे चंडीपाठ कैसे कर सकते थे? रूढ़िवादी हिंदुओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। आकाशवाणी के अधिकारियों ने वीरेंद्र कृष्ण भद्र पर भरोसा किया।

यह सुबह का कार्यक्रम साठ के दशक की शुरुआत तक सीधा प्रसारित होता था। तब भी, रिकॉर्डिंग अभी लोकप्रिय नहीं हुई थी। महालया से एक रात पहले, वीरेंद्र कृष्ण भद्र नंबर 1 गार्स्टिन प्लेस में रुकते थे। वे वहीं इस आयोजन की तैयारी करते थे। सुबह जल्दी नहा-धोकर, वह धोती और कुर्ता पहनकर चंडीपाठ पर बैठते थे। बाकी तो इतिहास है।

किन क्या आप जानते हैं, एक बार वीरेंद्र कृष्ण भद्र ने मधुर स्वर में चंडीपाठ करते हुए, मनोरंजन के लिए बंगाली टीका भी मधुर स्वर में सुनाई थी। लोगों को यह पसंद आया। उन्होंने टीका उसी तरह सुनाने का आदेश दिया। आज, हर बंगाली महिषासुरमर्दिनी की टीका उसी तरह सुन सकता है। इसी का नतीजा है कि आज भी लोग चंडीपाठ को उन्हीं के स्वर और आवेग में सुनना पसंद करते हैं।