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यह मछली दूसरे जबड़े से खाना खाती थी

31 करोड़ साल पुरानी मछली के जीवाश्म से नई जानकारी

  • कैसे करती थी यह मछली खाने का इस्तेमाल?

  • मछली का नाम प्लाटाइसोमस पारवुलस

  • कार्बोनिफेरस युग की चट्टानों में पाया गया

राष्ट्रीय खबर

रांचीः वैज्ञानिकों ने एक ऐसे दुर्लभ जीवाश्म की खोज की है, जो करीब 31 करोड़ साल पुराने मछली के बारे में चौंकाने वाला खुलासा करता है। यह मछली अपने मुंह के अंदर छिपे दूसरे जबड़े और दांतों का इस्तेमाल खाने के लिए करती थी। यह अपनी तरह का पहला ऐसा उदाहरण है, जो उस दौर के रे-फिन्ड (पंख वाली) मछली में देखने को मिला है। इस खोज से पता चलता है कि कैसे मछलियों ने समय के साथ विकसित होकर शिकार को पकड़ने और कुचलने के लिए नए-नए तरीके अपनाए।

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इस मछली का नाम प्लाटाइसोमस पारवुलस (Platysomus parvulus) है। यह अपने खाने के तरीके के लिए जानी जाती है, जिसे टंग बाइट कहा जाता है। इस तकनीक में, मछली अपने मुंह के ऊपरी और निचले हिस्से में मौजूद खास दांतों का इस्तेमाल करती थी। यह एक तरह के दूसरे जबड़े की तरह काम करता था, जिससे वह कठोर भोजन, जैसे कि कठोर कीड़े-मकोड़े या खोल वाले जीवों को आसानी से कुचल और चबा सकती थी।

आज की ज़्यादातर मछलियाँ अपने मुख्य जबड़ों से खाना खाती हैं, लेकिन कुछ प्रजातियाँ टंग बाइट का भी इस्तेमाल करती हैं। हालांकि, अब तक यह माना जाता था कि यह खासियत 15 करोड़ साल पहले की मछलियों में ही पाई जाती थी। इस नए जीवाश्म ने इस धारणा को बदल दिया है।

यह जीवाश्म ब्रिटेन के स्टाफर्डशायर में मिले कार्बोनिफेरस युग की चट्टानों में पाया गया था। अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस पर काम किया और इसके आंतरिक हिस्से की जानकारी हासिल करने के लिए हाई-रिज़ोल्यूशन सीटी स्कैनिंग का इस्तेमाल किया। इससे वैज्ञानिकों को मछली के मुंह के अंदरूनी हिस्से, दांतों और गिल स्केलेटन (गलफड़ों की हड्डी) की बनावट को समझने में मदद मिली। इस शोध के परिणाम बायोलॉजी लेटर्स नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के मुख्य शोधकर्ता प्रोफेसर सैम जाइल्स के अनुसार, हमारी यह खोज यह समझने में मदद करती है कि डेवोनियन मास एक्सटिंक्शन के बाद मछलियाँ कैसे विकसित हुईं। इस घटना में बहुत सारी प्रजातियाँ खत्म हो गईं, लेकिन इसके बाद मछलियों ने खुद को नए वातावरण के अनुसार ढालना और खाने के नए तरीके अपनाना शुरू कर दिया।

प्रोफेसर जाइल्स बताते हैं कि टंग बाइट का विकास कई अलग-अलग तरह की मछलियों में हुआ है। आज की कुछ आधुनिक मछलियों जैसे ट्राउट और बोनफिश में भी यह खासियत देखने को मिलती है। इससे यह साबित होता है कि यह एक उपयोगी तरीका है जो मछलियों को अलग-अलग प्रकार का खाना खाने और अलग-अलग वातावरण में जीवित रहने में मदद करता है।

शोध से पता चला है कि प्लाटाइसोमस जीवाश्म 3 डी में बहुत अच्छी तरह से संरक्षित है। इससे शोधकर्ताओं को उसके मुंह के अंदरूनी हिस्सों का डिजिटल विश्लेषण करने का मौका मिला। इसमें एक से ज़्यादा निचले दांत और संकरी ऊपरी प्लेट थी, जिससे पता चलता है कि यह आधुनिक टंग बाइट प्रणाली की तरफ एक विकासशील कड़ी है। को-ऑथर डॉ. मैथ्यू कोलमैन के अनुसार, प्लाटाइसोमस पारवुलस सरल जबड़े वाली मछलियों और टंग-बाइट मछलियों के बीच की एक विलुप्त कड़ी है।

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