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आंदोलन के पहले चरण में गुरुजी का जनता दरबार

No photo description available.शिव कुमार अग्रवाल

शिबू सोरेन, जिन्हें गुरुजी के नाम से जाना जाता है, का देवघर जेल से रिहा होना अपने आप में एक अविस्मरणीय घटना थी। पुराने लोगों ने बताया है कि आंदोलन के शुरुआती दिनों में गुरुजी के जनता दरबार में भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों, ठेकेदारों और व्यापारियों को दिल्ली दरबार की सजा दी जाती थी, जिसमें उन्हें सड़क पर रस्सी से घसीटा जाता था।
आपातकाल के दौरान की एक घटना में याद आया कि ज्ञान रंजन जी के साथ देवघर गए थे, जहां अचानक शिबू सोरेन से मिलने का कार्यक्रम बना, जो उस समय दुमका जेल में बंद थे। हजारों लोगों ने जेल के बाहर सड़क जाम कर रखी थी। डीएन सहाय (तत्कालीन एसपी दुमका/देवघर) की मदद से किसी तरह वे जेल तक पहुंचे।

ज्ञान रंजन जी अंदर गए और लगभग आधे घंटे बाद जब वे बाहर निकले, तो सलाखों के पीछे से एक सामान्य कद-काठी के व्यक्ति ने हाथ हिलाया। ज्ञान जी ने बताया कि वे शिबू सोरेन थे और रांची से उनसे मिलने आए थे।
इस मुलाकात के दौरान एक सिपाही ने बताया कि एक शाम आंदोलन कर रही महिलाओं ने रिहाई की मांग को लेकर अर्धनग्न प्रदर्शन किया था, जो भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ था।

इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को शिबू सोरेन को रिहा करने पर विवश होना पड़ा। जेल के अंदर ज्ञान रंजन जी और शिबू सोरेन के बीच क्या बात हुई, यह अज्ञात है, लेकिन ज्ञान रंजन जी ने यह ज़रूर कहा था कि शिबू सोरेन एक दिन झारखंड लेकर रहेंगे और उन्हें बस छोटानागपुर क्षेत्र में पहचान दिलाने की ज़रूरत है।
इसके बाद, 1980 के लोकसभा चुनाव में, गुरुजी ने कांग्रेस के कद्दावर नेता पृथ्वीचंद किस्कु के खिलाफ दुमका से चुनाव लड़ा और विजयी हुए। गुरुजी की मुलाकातें ज्ञान रंजन जी के घर पर होती रहीं।

ज्ञान रंजन जी की पहल पर ही कांग्रेस और झामुमो का गठबंधन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप झामुमो ने बिहार विधानसभा में 16 सीटें जीतकर श्री सोरेन के नेतृत्व में अपनी एक अलग पहचान बनाई। यहीं से झामुमो का राजनीतिक उदय हुआ। आज शिबू सोरेन के नेतृत्व का ही कमाल है कि झारखंड की दबी-कुचली जनता उन्हें सिर-माथे पर बिठाए हुए है।