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दिशोम गुरु यानी एक युग का अंत

दिशोम गुरु शिबू सोरेन से बतौर पत्रकार कई अवसरों पर मुलाकातें हुई और सामाजिक सरोकार से सीधे तौर पर जुड़े होने की वजह से मैंने कई मुद्दों पर उनसे संबंधित अफसरों के खिलाफ शिकायतें भी की। यह संयोग रहा कि हर बार शिकायत की जांच अपने स्तर पर कर लेने के बाद उन्होंने शिकायतों पर सकारात्मक कार्रवाई की। इस लिहाज से एक पत्रकार होने के नाते मेरी उनसे मुलाकात की अनगिनत यादें हैं, जिन्हें कम शब्दों में समेटा नहीं जा सकता। झारखंड आंदोलन को धार देने की कोशिशों के बीच उनका सभी झारखंडियों को एकजुट करने का प्रयास कई इलाकों में सफल रहा तो कुछेक इलाकों में इस कोशिश के नकारात्मक परिणाम भी निकले। बावजूद इसके गुरुजी ने कभी हार नहीं मानी और झारखंड नामधारी तमाम दलों और संगठनों को एकजुट करने के प्रयास में लगे रहे। जिसका असर यह हुआ कि धीरे धीरे ग्रामीण इलाकों में यह आंदोलन तेज होता चला गया। कई अवसरों पर पूर्ण आर्थिक नाकेबंदी के बाद केंद्र सरकार को यह बात समझ में आ गयी कि जिस संगठन को सरकार कमजोर समझ रही थी, उसकी असली ताकत क्या है और वह क्या क्या कर सकती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़े होने की वजह से झारखंड नामधारी दलों ने चुनावी राजनीति में भी अपना धाक कायम करना प्रारंभ कर दिया था। वैसे गुरुजी को समझने के लिए खास तौर पर संथाल परगना के ग्रामीण इलाकों में जाये बिना सारी कोशिशें बेकार होगी। पूरे संथाल परगना के ग्रामीण इलाकों में उनके एक निर्देश पर लोग जिस तरह प्रतिक्रिया करते थे और नगाड़ों के शोर से संकेत दूर तक चला जाता था, वह बताने की नहीं बल्कि महसूस करने वाली बात रही है।
                                                                                                                                 रजत कुमार गुप्ता

 

बतौर पत्रकार गुरुजी से पहली मुलाकात

कांग्रेस के दिग्गज नेता और उस वक्त के प्रभात खबर के मालिक ज्ञानरंजन ने अचानक एक रात पहले कहा कि सुबह तैयार होकर मेरे वर्धमान कंपाउंड स्थित घर पर आ जाना, वहां से कहीं चलना है। युवावस्था के पत्रकार को हमेशा ही नया कुछ जानने समझने की ललक होती है। इसलिए मैं समय से पहले तैयार होकर उनके घर पर चला गया।

वहां पहले से ही लोगों की भीड़ लगी थी, जिसके बीच उन्होंने मुझे देखकर बैठ जाने का इशारा किया। करीब आधा घंटा तक लोगों से बात चीत करने के बीच ही अचानक उनके घनिष्ठ सहयोगी आरपी राजा आये। उनके आने के बाद चलने का इशारा हुआ। उस वक्त आरपी राजा के पास एक जीप हुआ करती थी।

उसी जीप पर सवार होकर हम तीनों निकल गये। उस वक्त ओरमाझी से गोला जाने वाली सड़क नहीं बनी थी। इसलिए आरपी राजा खुद ही गाड़ी चलाते हुए रामगढ़ होते हुए गोला की तरफ बढ़े। बीच रास्ते में कई स्थानों पर ज्ञानरंजन अपने परिचितों से मिलते और बात करते जा रहे थे और मैं गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा सब कुछ देख समझ रहा है। अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ था कि हमलोग कहां जा रहे हैं।

गोला के पास आकर गाड़ी कच्ची सड़क पर मुड़ गयी और कुछ दूर घने जंगल में चलने के बाद जब गाड़ी एक छोटे से गांव के पास रोकी गयी तो जंगल से शिबू सोरन निकलकर आये। उनके साथ कुछ और लोग भी थे। ज्ञानरंजन ने तब मुझसे कहा कि अब शिबू सोरन का अच्छा सा इंटरव्यू प्रभात खबर के लिए ले लो ताकि यह अच्छे ढंग से छप सके।

पहले से तैयार नहीं होने के बाद भी पूर्व की जानकारी के साथ बातचीत प्रारंभ हुई। जब बात चीत गंभीर स्थिति में पहुंची तो पास खड़ी भीड़ को खुद ज्ञानरंजन ही अलग लेकर चले गये ताकि इस बातचीत में कोई बाधा नहीं हो। करीब आधे घंटे तक की बातचीत में अलग राज्य के आंदोलन से प्रारंभ होकर उनके सामाजिक सरोकार के आंदोलन और झामुमो के राजनीतिक भविष्य जैसे सभी विषयों पर बात चीत हुई। वहां से गाड़ी लौटने के क्रम में ज्ञानरंजन ने कहा कि जब यह इंटरव्यू तैयार हो जाए, तो मैं उन्हें एक बार दिखा दूं ताकि कोई वैसी राजनीतिक टिप्पणी उसमें ना रहे जो उनके और शिबू सोरेन के रिश्तों को खराब कर सके। लौटने के बाद वैसा ही हुआ और प्रभात खबर में शिबू सोरेन का वह पहला इंटरव्यू प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुआ।

कोयला अफसर के खिलाफ शिकायत पर तुरंत कार्रवाई

जब गुरुजी कोयला मंत्री थे तो सीसीएल में कोयला संबंधी गड़बड़ियों पर मेरा ध्यान अधिक रहता था। इसी क्रम में एक बड़ी खबर प्रकाशित करने के बाद वहां के एक बड़े अधिकारी ने अपने अंदाज में पहले खरीदने का प्रलोभन और बाद में धमकी देने का काम किया। युवावस्था होने की वजह से मैं भी भड़क गया और सीधे गुरुजी से शिकायत करने पहुंच गया। उस वक्त दुर्गा सोरेन जीवित थे और लगभग हम उम्र होने की वजह से उनसे रिश्ता बेहतर था। उन्हें मिलने की बात कहने पर दुर्गा ने सीधे उनके कमरे में जाने को कह दिया।

जब कमरे में पहुंचा तो सारा कमरा कोयला अफसरों से भरा था और हर कोई चुपचाप खड़ा था। ध्यान से देखने पर पता चला कि बैठे बैठे ही गुरुजी सो गये थे। लिहाजा कोई शोर नहीं कर रहा था। करीब पांस मिनट के बाद अचानक उनकी नींद खुली तो अफसरों से बातचीत प्रारंभ की। इसी बीच उनकी नजर किनारे खड़े मुझपर पड़ी तो आने की वजह पूछ लिया।

मैं तमाम कोयला अफसरों के सामने अपनी बात रखने से हिचक रहा था तो उन्होंने ही साफ साफ कहा अगर इनलोगों के खिलाफ भी कुछ कहना है तो साफ साफ कह दो, मैं देख लूंगा, मैं जानता हूं कि कोयला अफसर क्या क्या गुल खिलाते हैं। मैंने पूरी बात उनके सामने रख दी तो उन्होंने मुझे चले जाने को कहा। शाम को सीसीएल के विज्ञप्ति जारी हुई कि जिस अफसर के खिलाफ मैं शिकायत कर आया था. उन्हें कोयला मंत्री के निर्देश पर चलता कर दिया गया था।

तीसरी मुलाकात की अजीब दास्तां

बीच बीच में कभी कभार भेंट होने के बाद भी नियमित मिलना जुलना नहीं रहा। इस बीच हिंदुस्तान में काम करते वक्त मैं उनके मोरबाबाद स्थित मुख्यमंत्री आवास (जिसमें वह अब तक रहते आये थे) पर अपनी मोपेड से पहुंचे। वह बाहर ही बैठे थे और मोपेड से मुझे आते देख न सिर्फ चौंक गये बल्कि एक गंभीर राजनीतिक टिप्पणी भी कर दी।

उन्होंने कहा, इतने दिनों की पत्रकारिता के बाद भी मोपेड में जब चंद दिनों के पत्रकार तो अब गाड़ियों में घूम रहे हैं। सामने ही बैठे थे तो भीड़ भी थी और लोगों को हंसने का एक मौका मिल गया। बात हंसी मजाक में टल गयी लेकिन अपनी सामाजिक दृष्टि का संकेत उन्होंने इस एक वाक्य से साफ कर दिया और पत्रकारिता में आ रही गिरावट पर भी परोक्ष तौर पर एक साफ संदेश दे गये। वैसे जिस बात की शिकायत लेकर मैं उनके पास गया था, वह शिकायत भी शाम होते होते दूर हो गयी क्योंकि संबंधित अधिकारी ने खुद फोन पर यह जानकारी दी कि खुद मुख्यमंत्री ने फोन पर इस गलती को सुधारने को कहा है।