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घृणा के खिलाफ बोलना भी राष्ट्रप्रेम

देश में जिस माहौल को सरकारी संरक्षण में आगे बढ़ाया जा रहा है, उसके प्रति पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र भेजा है। सेवानिवृत्त सिविल सेवकों, राजनयिकों और सार्वजनिक हस्तियों के एक समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखा है, जिसमें उनसे भारत में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव पर तुरंत ध्यान देने का आग्रह किया गया है।

इस पत्र में अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर मुसलमानों और कुछ हद तक ईसाइयों के बीच अत्यधिक चिंता और असुरक्षा को उजागर किया गया है, क्योंकि कथित तौर पर इन घटनाओं ने अंतर-धार्मिक मतभेदों को और बढ़ा दिया है। 17 हस्ताक्षरकर्ताओं में योजना आयोग के पूर्व सचिव एनसी सक्सेना, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, ब्रिटेन में पूर्व उच्चायुक्त शिव मुखर्जी और पूर्व उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह (सेवानिवृत्त) शामिल हैं।

पत्र में हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंधों के बिगड़ने पर चिंता व्यक्त की है, उनका कहना है कि 2014 में मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद से यह प्रवृत्ति और भी खराब हो गई है। उनका कहना है कि देश के इतिहास में सांप्रदायिक संघर्ष एक आवर्ती मुद्दा रहा है, लेकिन पिछले 10 वर्षों में इसमें एक परेशान करने वाला बदलाव देखा गया है। पत्र में कुछ राज्य सरकारों और उनके प्रशासनिक तंत्र की भूमिका की ओर इशारा किया गया है, जिन्होंने कथित तौर पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव के कृत्यों को बढ़ावा देने या सहन करने में पक्षपातपूर्ण रुख दिखाया है।

पत्र में कहा गया है, ऐसा नहीं है कि अंतर-सामुदायिक संबंध हमेशा अच्छे रहे हैं। विभाजन की भयावह यादें, इसके लिए जिम्मेदार परिस्थितियां और इसके बाद हुए दुखद दंगे हमारे दिमाग में अभी भी मौजूद हैं। हम यह भी जानते हैं कि विभाजन के बाद भी, हमारे देश में समय-समय पर भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए हैं और अब स्थिति पहले की तुलना में न तो बेहतर है और न ही बदतर है।

हालांकि, पिछले 10 वर्षों की घटनाएं इस मायने में अलग हैं कि वे संबंधित राज्य सरकारों और उनके प्रशासनिक तंत्र की स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण भूमिका को दर्शाती हैं। हमारा मानना है कि यह अभूतपूर्व है, इसमें आगे कहा गया है। इसमें आगे कई घटनाओं का हवाला दिया गया है, जिसमें गोमांस ले जाने के आरोप में व्यक्तियों की सार्वजनिक रूप से हत्या, इस्लामोफोबिक घृणास्पद भाषण और स्थानीय प्रशासन के आदेश

 पर मुस्लिम घरों को नष्ट करना शामिल है, जो इस प्रवृत्ति को दर्शाता है।

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों ने मुस्लिम स्वामित्व वाले व्यवसायों पर हमलों की रिपोर्टों पर भी चिंता व्यक्त की है, जिससे आर्थिक और सामाजिक नुकसान हो रहा है।

वे मध्यकालीन मस्जिदों और दरगाहों, विशेष रूप से अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की सूफी दरगाह पर पुरातात्विक सर्वेक्षण करने के लिए दक्षिणपंथी समूहों द्वारा की गई मांगों को उजागर करते हैं, जिसके बारे में उनका आरोप है कि यह भारत के बहुलवादी इतिहास को फिर से लिखने का एक प्रयास है।

पत्र में कहा गया है कि पूजा स्थल अधिनियम द्वारा दी गई स्पष्ट कानूनी सुरक्षा के बावजूद, अदालतों ने इन मांगों पर अनुचित तत्परता और जल्दबाजी के साथ प्रतिक्रिया दी है। पत्र में कहा गया है, इस अद्वितीय समन्वयकारी स्थल पर वैचारिक हमला हमारी सभ्यतागत विरासत पर हमला है और समावेशी भारत के उस विचार को विकृत करता है जिसे आप स्वयं पुनर्जीवित करना चाहते हैं।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने मोदी से विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि सभी राज्य प्रशासन संविधान का सम्मान करें और कानून के शासन को बनाए रखें। वे भारत की धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि करने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक अंतरधार्मिक बैठक का भी आह्वान करते हैं। पत्र में कहा गया है, इस तरह की अशांति के सामने समाज प्रगति नहीं कर सकता और न ही विकसित भारत का आपका सपना साकार हो सकता है। इससे साफ हो जाता है कि केंद्र और कुछ राज्य सरकार के रुख ने इन अनुभवी पूर्व अफसरों तक को चिंतित कर दिया है। बार बार दूसरे दलों द्वारा इस बारे में आगाह किये जाने के बाद भी सरकारों की हिंदूवाद का दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट में भी चर्चा का विषय रहा है। शीर्ष अदालत ने पहले ही बुलडोजर संस्कृति पर अपना हथौड़ा चला दिया है और कहा है कि सरकार की अपनी मर्जी से जनता के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है। दिक्कत है कि देश का एक बहुत बड़ा पढ़ा लिखा और समझदार वर्ग भी ऐसे आचरण का या तो समर्थन करता है अथवा विरोध होने के बाद भी चुप रह जाता है। इस स्थिति में बदलाव के लिए सामाजिक स्तर पर प्रयास ही सबसे कारगर रास्ता हो सकता है।