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वास्तविकता के धरातल पर विकास की परख हो

देश में जीएसटी संग्रह में बढ़ोत्तरी को ही अब विकास की नया पैमाना बताया जा रहा है। ऐसी दलील देने वाले यह बताने से परहेज करते हैं कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा है। आज के दौर में खुद में कैद रहकर तरक्की नहीं हो सकती क्योंकि बदली हुई वैश्विक अर्थनीति की वजह से भी व्यापारिक लिहाज से पूरी दुनिया एक गांव में तब्दील हो गयी है।

सरकार यह आंकड़े जारी करने से परहेज करती है कि देश में निर्यात के किस क्षेत्र से कितनी आमदनी हो रही है और आयात के किन मुद्दों पर कितनी विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। सिर्फ यह बताया जाता है कि जीएसटी का राजस्व संग्रह बढ़ रहा है। सकल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) राजस्व मई महीने में 11.5 फीसदी बढ़कर 1.57 लाख करोड़ रुपये हो गया।

भले ही यह अप्रैल के प्रवाह की तुलना में 16 फीसदी कम संग्रह के साथ छह महीनों में सबसे धीमी वृद्धि को दर्शाता है, लेकिन इस पर एक बारीक नजर डालना जरूरी है। रिकॉर्ड 1.87 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार करने वाले अप्रैल के राजस्व में इजाफा वित्तीय वर्ष के अंत में किए जाने वाले अनुपालनों की वजह से हुआ था।

यों तो इस वित्तीय वर्ष के पहले महीने अप्रैल के दौरान हुए लेन-देन के लिए मई का संग्रह तीन महीनों में सबसे कम रहा, लेकिन वे एक व्यापक सकारात्मक रुझान का संकेत देते हैं। भले ही जीएसटी राजस्व लगातार 15 महीनों के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े से ज्यादा रहा है, लेकिन मई महीने का राजस्व सिर्फ छठा ऐसा मौका है जब जीएसटी राजस्व 1.5 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया है।

ऐसे चार मौके 2023 के दौरान आए हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अप्रैल के उछाल को परे रखने के बाद भी अक्टूबर 2022 और मई 2023 के बीच औसत मासिक राजस्व 1.53 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है (और अगर अप्रैल के रिकॉर्ड संग्रह को शामिल किया जाए, तो 1.57 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है)। अप्रैल में खुदरा मुद्रास्फीति के 4.7 फीसदी तक नरम रहने और थोक कीमतों के लुढ़क कर अपस्फीति में जाने के बावजूद राजस्व में कमी आई है। इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर, अगर महंगाई में गिरावट जारी रहती है, तो जीएसटी कोष में 10 फीसदी -12 फीसदी की वृद्धि दर ठीक मानी जानी चाहिए। भले ही वे पिछले साल की तुलना में ज्यादा शांत दिखें।

मई महीने की आर्थिक गतिविधियों के शुरुआती आंकड़े कुछ तेजी के संकेत दे रहे हैं। एसएंडपी के वैश्विक क्रय प्रबंधक सूचकांक (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) के मुताबिक, निर्माताओं के लिए अक्टूबर 2020 के बाद से यह उनका सबसे अच्छा महीना रहा। दो खराब महीनों के बाद ईंधन की बिक्री ने फिर से रफ्तार पकड़ी और ऑटोमोबाइल की बिक्री में तेजी है, हालांकि कुछ खंडों के लिए यह कम आधार पर है।

अन्य अनुपालन और उपभोग-आधारित अनुकूल हवा आने वाले महीनों में राजस्व में इजाफा कर सकते हैं। जुलाई तक, जब जीएसटी व्यवस्था के छह साल पूरे होंगे, राजस्व विभाग चोरी और फर्जी पंजीकरण से निपटने के लिए दो महीने का विशेष अभियान चला रहा है। उच्च राजस्व निहितार्थ वाले मामलों को प्राथमिकता देने के लिए रिटर्न की जांच की एक नई प्रणाली शुरू की गई है।

अगस्त महीने से पांच करोड़ रुपये से ज्यादा वार्षिक टर्नओवर वाली फर्मों के लिए ई-चालान अनिवार्य होगा, जिससे कर व्यवस्था में संभावित गड़बड़ी समाप्त हो जाएगी। बंद किए गए 2,000 रुपये के नोटों के कुछ धारक 30 सितंबर तक अपनी जमा राशि का कुछ हिस्सा खर्च करना चाहते हैं, इससे भी कुछ गति आ सकती है।

अगर संभावित रूप से मासिक जीएसटी राजस्व के लिए लगभग 1.55 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा नई आम हकीकत बनती है, तो सरकार को इस मौके को लपक लेना चाहिए ताकि नीतिगत स्तर की उन विसंगतियों को दूर करने में तेजी लाई जा सके जो अभी भी कर व्यवस्था को परेशान करती हैं। भले ही लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दायरा सीमित हो, लेकिन जीएसटी परिषद को अल्पकालिक समय में किए जाने वाले न्यायाधिकरण स्थापित करने, गेमिंग एवं कैसीनो के शुल्क को लेकर तस्वीर साफ करने और बोझिल दर संरचना को दुरुस्त करने वास्ते ब्लूप्रिंट तैयार करने जैसे कार्यों को अंजाम देने से चूकना नहीं चाहिए।

फिर भी सिर्फ जीएसटी संग्रह को देश के विकास का पैमाना मान लेना गलती होगी क्योंकि अनेक छोटे और लघु उद्योग अब भी जीएसटी भुगतान के बाद भी किसी तरह जिंदा रहने की जद्दोजहद में फंसे है। कागज पर ढेर सारी घोषणाएं होने के बाद भी दरअसल ऐसे उद्यमियों को केंद्र सरकार की तरफ से बहुत कम राहत मिल पायी है। दवा कारोबार से विदेशी मुद्रा की आमदनी के जो आसार बने थे, वे खांसी की दवा के कारण फिर से गायब हो चुके हैं। लिहाजा हम दरअसल कहां खड़े हैं, इसकी सही परख जरूरी है।